महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 45, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुदर्शनाय विदुषे भार्यार्थे देवरूपिणीम् ॥ ३९ ॥
ओघवती देवकन्याके समान सुन्दरी थी। ओघवान्ने अपनी उस पुत्रीको विद्वान् सुदर्शनको पत्नी बनानेके लिये दे दिया ॥ ३९ ॥
स गृहस्थाश्रमरतस्तया सह सुदर्शनः ।
कुरुक्षेत्रेऽवसद् राजन्नोघवत्या समन्वितः ॥ ४० ॥
राजन्! सुदर्शन उसके साथ गृहस्थ-धर्मका पालन करने लगे। उन्होंने ओघवतीके साथ कुरुक्षेत्रमें निवास किया ॥ ४० ॥
गृहस्थश्चावजेष्यामि मृत्युमित्येव स प्रभो ।
प्रतिज्ञामकरोद् धीमान् दीप्ततेजा विशाम्पते ॥ ४१ ॥
प्रजानाथ! प्रभो! उद्दीप्त तेजवाले उस बुद्धिमान् सुदर्शनने यह प्रतिज्ञा कर ली कि मैं गृहस्थ-धर्मका पालन करते हुए ही मृत्युको जीत लूँगा ॥ ४१ ॥
तामथौघवतीं राजन् स पावकसुतोऽब्रवीत् ।
अतिथेः प्रतिकूलं ते न कर्तव्यं कथंचन ॥ ४२ ॥
राजन्! अग्निकुमार सुदर्शनने ओघवतीसे कहा—'देवि! तुम्हें अतिथिके प्रतिकूल किसी तरह कोई कार्य नहीं करना चाहिये' ॥ ४२ ॥
येन येन च तुष्येत नित्यमेव त्वयातिथिः ।
अप्यात्मनः प्रदानेन न ते कार्या विचारणा ॥ ४३ ॥
'जिस-जिस वस्तुसे अतिथि संतुष्ट हो, वह वस्तु तुम्हें सदा ही उसे देनी चाहिये। यदि अतिथिके संतोषके लिये तुम्हें अपना शरीर भी देना पड़े तो मनमें कभी अन्यथा विचार न करना ॥ ४३ ॥
एतद् व्रतं मम सदा हृदि सम्परिवर्तते ।
गृहस्थानां च सुश्रोणि नातिथेर्विद्यते परम् ॥ ४४ ॥
'सुन्दरी! अतिथि-सेवाका यह व्रत मेरे हृदयमें सदा स्थित रहता है। गृहस्थोंके लिये अतिथि-सेवासे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है ॥ ४४ ॥
प्रमाणं यदि वामोरु वचस्ते मम शोभने ।
इदं वचनमव्यग्रा हृदि त्वं धारयेः सदा ॥ ४५ ॥
'वामोरु शोभने! यदि तुम्हें मेरा वचन मान्य हो तो मेरी इस बातको शान्त भावसे सदा अपने हृदयमें धारण किये रहना ॥ ४५ ॥
निष्क्रान्ते मयि कल्याणि तथा संनिहितेऽनघे ।
नातिथिस्तेऽवमन्तव्यः प्रमाणं यद्यहं तव ॥ ४६ ॥
'कल्याणि! निष्पाप! यदि तुम मुझे आदर्श मानती हो तो मैं घरमें रहूँ या घरसे कहीं दूर निकल जाऊँ, तुम्हें किसी भी दशामें अतिथिका अनादर नहीं करना चाहिये' ॥ ४६ ॥
तमब्रवीदोघवती तथा मूर्ध्नि कृताञ्जलिः ।