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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 448

नेत्राभ्यां नेत्रयोरस्या रश्मिं संयोज्य रश्मिभिः ।
विवेश विपुलः कायमाकाशं पवनो यथा ॥ ५७ ॥
‘फिर अपने दोनों नेत्रोंको उन्होंने उसके नेत्रोंकी ओर लगाया और अपने नेत्रोंकी किरणोंको उसके नेत्रोंकी किरणोंके साथ जोड़ दिया। फिर उसी मार्गसे आकाशमें प्रविष्ट होनेवाली वायुकी भाँति रुचिके शरीरमें प्रवेश किया’ ॥ ५७ ॥

लक्षणं लक्षणेनैव वदनं वदनेन च ।
अविचेष्टन्नतिष्ठद् वै छायेवान्तर्हितो मुनिः ॥ ५८ ॥
‘वे लक्षणोंसे लक्षणोंमें और मुखके द्वारा मुखमें प्रविष्ट हो कोई चेष्टा न करते हुए स्थिर भावसे स्थित हो गये। उस समय अन्तर्हित हुए विपुल मुनि छायाके समान प्रतीत होते थे’ ॥ ५८ ॥

ततो विष्टभ्य विपुलो गुरुपत्नयाः कलेवरम् ।
उवास रक्षणे युक्तो न च सा तमबुद्ध्यत ॥ ५९ ॥
‘विपुल गुरुपत्नीके शरीरको स्तम्भित करके उसकी रक्षामें संलग्न हो वहीं निवास करने लगे। परंतु रुचिको अपने शरीरमें उनके आनेका पता न चला ॥ ५९ ॥

यं कालं नागतो राजन् गुरुस्तस्य महात्मनः ।
क्रतुं समाप्य स्वगृहं तं कालं सोऽभ्यरक्षत ॥ ६० ॥
‘राजन्! जबतक महात्मा विपुलके गुरु यज्ञ पूरा करके अपने घर नहीं लौटे तबतक विपुल इसी प्रकार अपनी गुरुपत्नीकी रक्षा करते रहे’ ॥ ६० ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विपुलोपाख्याने चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विपुलका उपाख्यानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ६२ श्लोक हैं)