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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 416, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 416

यद् ब्राह्मणमुखात् प्राप्तं प्रतिगृह्णन्ति वै वचः ।
भूतात्मानो महात्मानस्ते न यान्ति पराभवम् ॥ १५ ॥
ब्राह्मणके मुखसे जो वाणी निकलती है, उसे जो शिरोधार्य करते हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंको आत्मभावसे देखनेवाले महात्मा कभी पराभवको नहीं प्राप्त होते हैं ॥
क्षत्रियाणां प्रतपतां तेजसा च बलेन च ।
ब्राह्मणेष्वेव शाम्यन्ति तेजांसि च बलानि च ॥ १६ ॥
अपने तेज और बलसे तपते हुए क्षत्रियोंके तेज और बल ब्राह्मणोंके सामने आनेपर ही शान्त होते हैं ॥
भृगवस्तालजंघांश्च नीपानाङ्गिरसोऽजयन् ।
भरद्वाजो वैहत्तव्यानैलांश्च भरतर्षभ ॥ १७ ॥
भरतश्रेष्ठ! भृगुवंशी ब्राह्मणोंने तालजंघोंको, अंगिराकी संतानोंने नीपवंशी राजाओंको तथा भरद्वाजने हैहयोंको और इलाके पुत्रोंको पराजित किया था ॥ १७ ॥
चित्रायुधांश्चाप्यजयन्नेते कृष्णाजिनध्वजाः ।
प्रक्षिप्याथ च कुम्भान् वै पारगामिनमारभेत् ॥ १८ ॥
क्षत्रियोंके पास अनेक प्रकारके विचित्र आयुध थे तो भी कृष्णमृगचर्म धारण करनेवाले इन ब्राह्मणोंने उन्हें हरा दिया। क्षत्रियको चाहिये कि ब्राह्मणोंको जलपूर्ण कलश दान करके पारलौकिक कार्य आरम्भ करे ॥ १८ ॥
यत् किंचित् कथ्यते लोके श्रूयते पठ्यतेऽपि वा ।
सर्वं तद् ब्राह्मणेष्वेव गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥ १९ ॥
संसारमें जो कुछ कहा-सुना या पढ़ा जाता है वह सब काठमें छिपी हुई आगकी तरह ब्राह्मणोंमें ही स्थित है ॥ १९ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
संवादं वासुदेवस्य पृथ्व्याश्च भरतर्षभ ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! इस विषयमें जानकार लोग भगवान् श्रीकृष्ण और पृथ्वीके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २० ॥

वासुदेव उवाच

मातरं सर्वभूतानां पृच्छे त्वां संशयं शुभे ।
केनस्वित् कर्मणा पापं व्यपोहति नरो गृही ॥ २१ ॥
श्रीकृष्णने पूछा—शुभे! तुम सम्पूर्ण भूतोंकी माता हो, इसलिये मैं तुमसे एक संदेह पूछ रहा हूँ। गृहस्थ मनुष्य किस कर्मके अनुष्ठानसे अपने पापका नाश कर सकता है? ॥ २१ ॥

पृथिव्युवाच