महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 412, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरतश्रेष्ठ! कितने ही ब्राह्मण राजाओं तथा अन्य लोगोंके यहाँ सब प्रकारके कार्य करनेमें समर्थ होते हैं और अनेक ब्राह्मण नाना प्रकारके आकार धारण करते हैं ।। १३ ।।
नानाकर्मसु रक्तानां बहुकर्मोपजीविनाम् ।
धर्मज्ञानां सतां तेषां नित्यमेवानुकीर्तयेत् ।। १४ ।।
नाना प्रकारके कर्मोंमें संलग्न तथा अनेक कर्मोंसे जीविका चलानेवाले उन धर्मज्ञ एवं सत्पुरुष ब्राह्मणोंका सदा ही गुण गाना चाहिये ।। १४ ।।
पितॄणां देवतानां च मनुष्योरगरक्षसाम् ।
पुराप्येते महाभागा ब्राह्मणा वै जनाधिप ।। १५ ।।
नरेश्वर! प्राचीनकालसे ही ये महाभाग ब्राह्मण-लोग देवता, पितर, मनुष्य, नाग और राक्षसोंके पूजनीय हैं ।। १५ ।।
नैते देवैर्न पितृभिर्न गन्धर्वैर्न राक्षसैः ।
नासुरैर्न पिशाचैश्च शक्या जेतुं द्विजातयः ।। १६ ।।
ये द्विज न तो देवताओं, न पितरों, न गन्धर्वों, न राक्षसों, न असुरों और न पिशाचोंद्वारा ही जीते जा सकते हैं ।। १६ ।।
अदैवं दैवतं कुर्युर्दैवतं चाप्यदैवतम् ।
यमिच्छेयुः स राजा स्याद् ये नेष्टः स पराभवेत् ।। १७ ।।
ये चाहें तो जो देवता नहीं है उसे देवता बना दें और जो देवता हैं उन्हें भी देवत्वसे गिरा दें। ये जिसे राजा बनाना चाहें वही राजा रह सकता है। जिसे राजाके रूपमें ये न देखना चाहें उसका पराभव हो जाता है ।। १७ ।।
परिवादं च ये कुर्युर्ब्राह्मणानामचेतसः ।
सत्यं ब्रवीमि ते राजन् विनश्येयुर्न संशयः ।। १८ ।।
राजन्! मैं तुमसे यह सच्ची बात बता रहा हूँ कि जो मूढ़ मानव ब्राह्मणोंकी निन्दा करते हैं वे नष्ट हो जाते हैं—इसमें संशय नहीं है ।। १८ ।।
निन्दाप्रशंसाकुशलाः कीर्त्यकीर्तिपरायणाः ।
परिकुप्यन्ति ते राजन् सततं द्विषतां द्विजाः ।। १९ ।।
निन्दा और प्रशंसामें निपुण तथा लोगोंके यश और अपयशको बढ़ानेमें तत्पर रहनेवाले द्विज अपने प्रति सदा द्वेष रखनेवालोंपर कुपित हो उठते हैं ।। १९ ।।
ब्राह्मणा यं प्रशंसन्ति पुरुषः स प्रवर्धते ।
ब्राह्मणैर्यः पराकृष्टः पराभूयात् क्षणाद्धि सः ।। २० ।।
ब्राह्मण जिसकी प्रशंसा करते हैं; उस पुरुषका अभ्युदय होता है और जिसको वे शाप देते हैं; उसका एक क्षणमें पराभव हो जाता है ।। २० ।।
शका यवनकाम्बोजास्तास्ताः क्षत्रियजातयः ।
वृषलत्वं परिगता ब्राह्मणानामदर्शनात् ।। २१ ।।