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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 408

तुलां ततः समारूढः स्वं मांसक्षयमुत्सृजन् ॥ २९ ॥
जब राजाके शरीरका मांस चुक गया और रक्तकी धारा बहाता हुआ हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया तब वे मांस काटनेका काम बंद करके स्वयं ही तराजूपर चढ़ गये ॥ २९ ॥

ततः सेन्द्रास्त्रयो लोकास्तं नरेन्द्रमुपस्थिताः ।
भेर्यश्चाकाशगैस्तत्र वादिता देवदुन्दुभिः ॥ ३० ॥
फिर तो इन्द्र आदि देवताओंसहित तीनों लोकोंके प्राणी उन नरेन्द्रके पास आ पहुँचे। कुछ देवता आकाशमें ही खड़े होकर दुन्दुभियाँ बजाने लगे ॥ ३० ॥

अमृतेनावसिक्तश्च वृषदभों नरेश्वरः ।
दिव्यैश्च सुसुखैर्माल्यैरभिवृष्टः पुनः पुनः ॥ ३१ ॥
कुछ देवताओंने राजा वृषदर्भको अमृतसे नहलाया और उनके ऊपर अत्यन्त सुखदायक दिव्य पुष्पोंकी बारंबार वर्षा की ॥ ३१ ॥

देवगन्धर्वसंघातैरप्सरोभिश्च सर्वतः ।
नृत्तैश्चोपगीतश्च पितामह इव प्रभुः ॥ ३२ ॥
देव-गन्धर्वोंके समुदाय और अप्सराएँ सब ओरसे उन्हें घेरकर गाने और नाचने लगीं। वे उनके बीचमें भगवान् ब्रह्माजीके समान शोभा पाने लगे ॥ ३२ ॥

हेमप्रासादसम्बाधं मणिकाञ्चनतोरणम् ।
स वैडूर्यमणिस्तम्भं विमानं समधिष्ठितः ॥ ३३ ॥
इतनेहीमें एक दिव्य विमान उपस्थित हुआ जिसमें सुवर्णके महल बने हुए थे। सोने और मणियोंकी बन्दनवारें लगी थीं और वैडूर्यमणिके खम्भे शोभा पा रहे थे ॥ ३३ ॥

स राजर्षिर्गतः स्वर्गं कर्मणा तेन शाश्वतम् ।
राजर्षि उशीनर उस विमानमें बैठकर उस पुण्यकर्मके प्रभावसे सनातन दिव्यलोकको प्राप्त हुए ॥ ३३ १/२ ॥

शरणागतेषु चैवं त्वं कुरु सर्वं युधिष्ठिर ॥ ३४ ॥
भक्तानामनुरक्तानामाश्रितानां च रक्षिता ।
दयावान् सर्वभूतेषु परत्र सुखमेधते ॥ ३५ ॥
युधिष्ठिर! तुम भी शरणागतोंके लिये इसी प्रकार अपना सर्वस्व निछावर कर दो। जो मनुष्य अपने भक्त, प्रेमी और शरणागत पुरुषोंकी रक्षा करता है तथा सब प्राणियोंपर दया रखता है वह परलोकमें सुख पाता है ॥ ३४-३५ ॥

साधुवृत्तो हि यो राजा सद्वृत्तमनुतिष्ठति ।
किं न प्राप्तं भवेत् तेन स्वव्याजेनेह कर्मणा ॥ ३६ ॥
जो राजा सदाचारी होकर सबके साथ सद्बर्ताव करता है वह अपने निश्छल कर्मसे किस वस्तुको नहीं प्राप्त कर लेता ॥ ३६ ॥

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 408, कुल 2566 में से · SarvaKosh