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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 349

श्यामाश्रममें जाकर वहाँ स्नान, निवास तथा एक पक्षतक उपवास करनेवाला पुरुष अन्तर्धानके फलको प्राप्त कर लेता है ॥ ३० ॥

कौशिकीं तु समासाद्य वायुभक्षस्त्वलोलुपः ।
एकविंशतिरात्रेण स्वर्गमारोहते नरः ॥ ३१ ॥
जो कौशिकी नदीमें स्नान करके लोलुपता त्यागकर इक्कीस रातोंतक केवल हवा पीकर रह जाता है वह मनुष्य स्वर्गको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥

मतङ्गवाप्यां यः स्नायादेकरात्रेण सिद्ध्यति ।
विगाहति ह्यनालम्बमन्धकं वै सनातनम् ॥ ३२ ॥
नैमिषे स्वर्गतीर्थे च उपस्पृश्य जितेन्द्रियः ।
फलं पुरुषमेधस्य लभेन्मासं कृतोदकः ॥ ३३ ॥
जो मतङ्गवापी तीर्थमें स्नान करता है, उसे एक रातमें सिद्धि प्राप्त होती है। जो अनालम्ब, अन्धक और सनातन तीर्थमें गोता लगाता है तथा नैमिषारण्यके स्वर्गतीर्थमें स्नान करके इन्द्रिय-संयमपूर्वक एक मासतक पितरोंको जलाञ्जलि देता है उसे पुरुषमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ३२-३३ ॥

गङ्गाह्रद उपस्पृश्य तथा चैवोत्पलावने ।
अश्वमेधमवाप्नोति तत्र मासं कृतोदकः ॥ ३४ ॥
जो गङ्गाह्रद और उत्पलावनतीर्थमें स्नान करके एक मासतक वहाँ पितरोंका तर्पण करता है, वह अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ॥ ३४ ॥

गङ्गायमुनयोस्तीर्थे तथा कालञ्जरे गिरौ ।
दशाश्वमेधानाप्नोति तत्र मासं कृतोदकः ॥ ३५ ॥
गङ्गा-यमुनाके सङ्गमतीर्थमें तथा कालञ्जरतीर्थमें एक मासतक स्नान और तर्पण करनेसे दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है ॥ ३५ ॥

षष्टिह्रद उपस्पृश्य चान्नदानाद् विशिष्यते ।
दशतीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथा पराः ॥ ३६ ॥
समागच्छन्ति माघ्यां तु प्रयागे भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! षष्टिह्रद नामक तीर्थमें स्नान करनेसे अन्नदानसे भी अधिक फल प्राप्त होता है। माघ-मासकी अमावास्याको प्रयागराजमें तीन करोड़ दस हजार अन्य तीर्थोंका समागम होता है ॥ ३६ १/२ ॥

माघमासं प्रयागे तु नियतः संशितव्रतः ॥ ३७ ॥
स्नात्वा तु भरतश्रेष्ठ निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् ।
भरतश्रेष्ठ! जो नियमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करते हुए माघके महीनेमें प्रयागमें स्नान करता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गमें जाता है ॥ ३७ १/२ ॥

मरुद्गण उपस्पृश्य पितृणामाश्रमे शुचिः ॥ ३८ ॥

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