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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 265

सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वदेवमयो गुरुः ॥ १३२ ॥
८३५ हर्यक्षः—सिंहस्वरूप, ८३६ ककुभः—सम्पूर्ण दिशास्वरूप, ८३७ वज्री—वज्रधारी, ८३८ शतजिह्वः—सैकड़ों जिह्वावाले, ८३९ सहस्रपात् सहस्रमूर्धा—सहस्रों पैर और मस्तकवाले, ८४० देवेन्द्रः—देवताओंके राजा, ८४१ सर्वदेवमयः—सम्पूर्ण देवस्वरूप, ८४२ गुरुः—सबके ज्ञानदाता ॥ १३२ ॥
सहस्रबाहुः सर्वाङ्गः शरण्यः सर्वलोककृत् ।
पवित्रं त्रिककुन्मन्त्रः कनिष्ठः कृष्णपिङ्गलः ॥ १३३ ॥
८४३ सहस्रबाहुः—सहस्रों भुजाओंवाले, ८४४ सर्वाङ्गः—समस्त अंगोंसे सम्पन्न, ८४५ शरण्यः—शरण लेनेके योग्य, ८४६ सर्वलोककृत्—सम्पूर्ण लोकोंके उत्पन्न करनेवाले, ८४७ पवित्रम्—परम पावन, ८४८ त्रिककुन्मन्त्रः—त्रिपदा गायत्रीरूप, ८४९ कनिष्ठः—अदितिके पुत्रोंमें छोटे, वामनरूपधारी विष्णु, ८५० कृष्णपिङ्गलः—श्याम-गौर हरि-हर-मूर्ति ॥ १३३ ॥
ब्रह्मदण्डविनिर्माता शतघ्नीपाशशक्तिमान् ।
पद्मगर्भो महागर्भो ब्रह्मगर्भो जलोद्भवः ॥ १३४ ॥
८५१ ब्रह्मदण्डविनिर्माता—ब्रह्मदण्डका निर्माण करनेवाले, ८५२ शतघ्नीपाशशक्तिमान्—शतघ्नी, पाश और शक्तिसे युक्त, ८५३ पद्मगर्भः—ब्रह्मास्वरूप, ८५४ महागर्भः—जगत्रूप गर्भको धारण करनेवाले होनेसे महागर्भ, ८५५ ब्रह्मगर्भः—वेदको उदरमें धारण करनेवाले, ८५६ जलोद्भवः—एकार्णवके जलमें प्रकट होनेवाले ॥ १३४ ॥
गभस्तिर्ब्रह्मकृद् ब्रह्मी ब्रह्मविद् ब्राह्मणो गतिः ।
अनन्तरूपो नैकात्मा तिग्मतेजाः स्वयम्भुवः ॥ १३५ ॥
८५७ गभस्तिः—सूर्यस्वरूप, ८५८ ब्रह्मकृत्—वेदोंका आविष्कार करनेवाले, ८५९ ब्रह्मी—वेदाध्यायी, ८६० ब्रह्मवित्—वेदार्थवेत्ता, ८६१ ब्राह्मणः—ब्रह्मनिष्ठ, ८६२ गतिः—ब्रह्मनिष्ठोंकी परमगति, ८६३ अनन्तरूपः—अनन्त रूपवाले, ८६४ नैकात्मा—अनेक शरीरधारी, ८६५ तिग्मतेजाः स्वयम्भुवः—ब्रह्माजीकी अपेक्षा प्रचण्ड तेजस्वी ॥ १३५ ॥
ऊर्ध्वगात्मा पशुपतिर्वातरंहा मनोजवः ।
चन्दनी पद्मनालाग्रः सुरभ्युत्तरणो नरः ॥ १३६ ॥
८६६ ऊर्ध्वगात्मा—देश-काल-वस्तुकृत उपाधिसे अतीत स्वरूपवाले, ८६७ पशुपतिः—जीवोंके स्वामी, ८६८ वातरंहाः—वायुके समान वेगशाली, ८६९ मनोजवः—मनके समान वेगशाली, ८७० चन्दनी—चन्दनचर्चित अंगवाले, ८७१ पद्मनालाग्रः—पद्मनालके मूल विष्णुस्वरूप, ८७२ सुरभ्युत्तरणः—सुरभिको नीचे उतारनेवाले, ८७३ नरः—पुरुषरूप ॥ १३६ ॥
कर्णिकारमहास्रग्वी नीलमौलिः पिनाकधृत् ।