महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2311, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें'धर्मराजने आपसे कहलाया है कि भीमसेन पूर्व वैरका स्मरण करके जो कभी-कभी आपके साथ अन्याय-सा कर बैठते हैं, उसके लिये आप इनपर क्रोध न कीजियेगा।। ७।।
एवं प्रायो हि धर्मोऽयं क्षत्रियाणां नराधिप ।
युद्धे क्षत्रियधर्मे च निरतोऽयं वृकोदरः ॥ ८ ॥
'नरेश्वर! क्षत्रियोंका यह धर्म प्रायः ऐसा ही है। भीमसेन युद्ध और क्षत्रिय-धर्ममें प्रायः निरत रहते हैं।।
वृकोदरकृते चाहमर्जुनश्च पुनः पुनः।
प्रसीद याचे नृपते भवान् प्रभुरिहास्ति यत् ॥ ९ ॥
'भीमसेनके कटु बर्तावके लिये मैं और अर्जुन दोनों आपसे बार-बार क्षमायाचना करते हैं। नरेश्वर! आप प्रसन्न हों। मेरे पास जो कुछ भी है, उसके स्वामी आप ही हैं।। ९ ।।
तद् ददातु भवान् वित्तं यावदिच्छसि पार्थिव ।
त्वमीश्वरोऽस्य राज्यस्य प्राणानामपि भारत ॥ १० ॥
'पृथ्वीनाथ! भरतनन्दन! आप जितना धन दान करना चाहें, करें। आप मेरे राज्य और प्राणोंके भी ईश्वर हैं' ।। १० ।।
ब्रह्मदेयाग्रहारांश्च पुत्राणामौर्ध्वदेहिकम् ।
इतो रत्नानि गाश्चैव दासीदासमजाविकम् ॥ ११ ॥
आनयित्वा कुरुश्रेष्ठो ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छतु ।
'ब्राह्मणोंको माफी जमीन दीजिये और पुत्रोंका श्राद्ध कीजिये।' युधिष्ठिरने यह भी कहा है कि 'महाराज धृतराष्ट्र मेरे यहाँसे नाना प्रकारके रत्न, गौएँ, दास, दासियाँ और भेड़-बकरे मँगवाकर ब्राह्मणोंको दान करें ।। ११ १/२ ।।
दीनान्धकृपणेभ्यश्च तत्र तत्र नृपाज्ञया ॥ १२ ॥
बह्वन्नरसपानाढ्याः सभा विदुर कारय ।
गवां निपानान्यन्यच्च विविधं पुण्यकं कुरु ॥ १३ ॥
'विदुरजी! आप राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे दीनों, अन्धों और कंगालोंके लिये भिन्न-भिन्न स्थानोंमें प्रचुर अन्न, रस और पीनेयोग्य पदार्थोंसे भरी हुई अनेक धर्मशालाएँ बनवाइये तथा गौओंके पानी पीनेके लिये बहुत-से पौंसलोंका निर्माण कीजिये। साथ ही दूसरे भी विविध प्रकारके पुण्य कीजिये ।। १२-१३ ।।
इति मामब्रवीद् राजा पार्थश्चैव धनंजयः ।
यदत्रानन्तरं कार्यं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १४ ॥
'इस प्रकार राजा युधिष्ठिर और अर्जुनने मुझसे बार-बार कहा है। अब इसके बाद जो कार्य करना हो, उसे आप बताइये' ।। १४ ।।
इत्युक्ते विदुरेणाथ धृतराष्ट्रोऽभिनन्द्य तान् ।
मनश्चक्रे महादाने कार्तिकां जनमेजय ॥ १५ ॥