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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2274, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2274

ते तु सम्मानिता राजंस्त्वया कार्यहितार्थिना ।
प्रवक्ष्यन्ति हितं तात सर्वथा तव भारत ॥ १२ ॥
'राजन्! तात! भरतनन्दन! अपना हित करनेकी इच्छासे तुम्हारे द्वारा सम्मानित होनेपर वे सर्वथा तुम्हारे हितकी ही बात बतायेंगे ॥ १२ ॥

इन्द्रियाणि च सर्वाणि वाजिवत् परिपालय ।
हितायैव भविष्यन्ति रक्षितं द्रविणं यथा ॥ १३ ॥
'जैसे सारथि घोड़ोंको काबूमें रखता है, उसी प्रकार तुम सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अधीन रखकर उनकी रक्षा करो। ऐसा करनेसे वे इन्द्रियाँ सुरक्षित धनकी भाँति भविष्यमें तुम्हारे लिये निश्चय ही हितकर होंगी ॥ १३ ॥

अमात्यानुपधातीतान् पितृपैतामहान् शुचीन् ।
दान्तान् कर्मसु पुण्यांश्च पुण्यान् सर्वेषु योजयेः ॥ १४ ॥
'जो जाँचे-बूझे हुए तथा निष्कपटभावसे काम करनेवाले हों, जो पिता-पितामहोंके समयसे काम देखते आ रहे हों तथा जो बाहर-भीतरसे शुद्ध, संयमी और जन्म एवं कर्मसे भी पवित्र हों, ऐसे मन्त्रियोंको ही सब तरहके उत्तरदायित्वपूर्ण कार्योंमें नियुक्त करना ॥ १४ ॥

चारयेथाश्च सततं चारैरविदितः परैः ।
परीक्षितैर्बहुविधैः स्वराष्ट्रप्रतिवासिभिः ॥ १५ ॥
'जिनकी किसी अवसरपर परीक्षा कर ली गयी हो और जो अपने ही राज्यके भीतर निवास करनेवाले हों, ऐसे अनेक जासूसोंको भेजकर उनके द्वारा शत्रुओंका गुप्त भेद लेते रहना और प्रयत्नपूर्वक ऐसी चेष्टा करना, जिससे शत्रु तुम्हारा भेद न जान सकें' ॥ १५ ॥

पुरं च ते सुगुप्तं स्याद् दृढप्राकारतोरणम् ।
अट्टाट्टालकसम्बाधं षट्पदं सर्वतोदिशम् ॥ १६ ॥
'तुम्हारे नगरकी रक्षाका पूर्ण प्रबन्ध रहना चाहिये। उसके चारों ओरकी दीवारें तथा मुख्य द्वार अत्यन्त सुदृढ़ होने चाहिये। बीचका सारा नगर ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओंसे भरा होना चाहिये। सब दिशाओंमें छः चहारदीवारियाँ बननी चाहिये ॥ १६ ॥

तस्य द्वाराणि सर्वाणि पर्याप्तानि बृहन्ति च ।
सर्वतः सुविभक्तानि यन्त्रैरारक्षितानि च ॥ १७ ॥
'नगरके सभी दरवाजे विस्तृत एवं विशाल हों। सब ओर उनकी रक्षाके लिये यन्त्र लगे हों तथा उन द्वारोंका विभाग सुन्दर ढंगसे सम्पन्न हो ॥ १७ ॥

पुरुषैरलमर्थस्ते विदितैः कुलशीलतः ।
आत्मा च रक्ष्यः सततं भोजनादिषु भारत ॥ १८ ॥
'भारत! जिन मनुष्योंके कुल और शील अच्छी तरह ज्ञात हों, उन्हींसे तुम्हें काम लेना चाहिये। भोजन आदिके अवसरोंपर सदा तुम्हें आत्मरक्षापर ध्यान देना चाहिये ॥ १८ ॥