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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2092, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2092

अयाचितप्रदाता यः स याति गतिमुत्तमाम्।
समाहूय तु यो दद्यान्मध्यमां स गतिं व्रजेत् ।
याचितो यश्च वै दद्याज्जघन्यां स गतिं व्रजेत् ॥
जो याचना न करनेवालेको देता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त करता है; जो बुलाकर देता है, वह मध्यम गतिको जाता है और जो याचना करनेवालेको देता है, वह नीची गति पाता है ॥

उत्तमा दैविकी ज्ञेया मध्यमा मानुषी गतिः ।
गतिर्जघन्या तिर्यक्षु गतिरेषा त्रिधा स्मृता ॥
दैवी गतिको उत्तम समझना चाहिये। मानुषी गति मध्यम है और तिर्यग्योनियाँ नीच गति है—यह इनका तीन प्रकार माना गया है ॥

पात्रभूतेषु विप्रेषु संस्थितेष्वाहिताग्निषु ।
यत्तु निक्षिप्यते दानमक्षयं सम्प्रकीर्तितम् ॥
दानके उत्तम पात्र अग्निहोत्री ब्राह्मणको जो दान दिया जाता है, वह अक्षय बतलाया गया है ॥

श्रोत्रियाणां दरिद्राणां भरणं कुरु पार्थिव ।
समृद्धानां द्विजातीनां कुर्यास्तेषां तु रक्षणम् ॥
अतः भूपाल! जो वेदके विद्वान् होते हुए दरिद्र हों, उनके भरण-पोषणका तुम स्वयं प्रबन्ध करो और सम्पत्तिशाली द्विजोंकी रक्षा करते रहो ॥

दरिद्रान् वित्तहीनांश्च प्रदानैः सुष्ठु पूजय ।
आतुरस्यौषधैः कार्यं नीरुजस्य किमौषधैः ॥
धनहीन दरिद्र ब्राह्मणोंको दान देकर उनकी भलीभाँति पूजा करो; क्योंकि रोगीको ही ओषधिकी आवश्यकता है, नीरोगको ओषधिसे क्या प्रयोजन? ॥

पापं प्रतिग्रहीतारं प्रदातुरुपगच्छति ।
प्रतिग्रहीतुर्यत् पुण्यं प्रदातारमुपैति तत् ।
तस्माद् दानं सदा कार्यं परत्र हितमिच्छता ॥
दाताका पाप दानके साथ ही दान लेनेवालेके पास चला जाता है और उसका पुण्य दाताको प्राप्त हो जाता है, अतः परलोकमें अपना हित चाहनेवाले पुरुषको सदा दान करते रहना चाहिये ॥

वेदविद्यावदातेषु सदा शूद्रान्नवर्जिषु ।
प्रयत्नेन विधातव्यो महादानमयो निधिः ॥
जो वेद-विद्या पढ़कर अत्यन्त शुद्ध आचार-विचारसे रहते हों और शूद्रोंका अन्न कभी नहीं ग्रहण करते हों, ऐसे विद्वानोंको प्रयत्नपूर्वक बड़े-बड़े दानोंका भाण्डार बनाना चाहिये ॥