सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2086, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2086

श्रीभगवानुवाच

शृणु राजन् यथान्यायं वचनं तथ्यमुत्तमम् ।
कथ्यमानं मया पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥
श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! मैं तुम्हें न्यायके अनुसार यथार्थ एवं उत्तम उपदेश सुनाता हूँ, ध्यान देकर सुनो। यह विषय परम पवित्र और सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला है॥

वृथा च दश जन्मानि चत्वारि च नराधिप ।
वृथा दानानि पञ्चाशत्पञ्चैव च यथाक्रमम् ॥
वृथा च जीवितं येषां ते च षट् परिकीर्तिताः ।
अनुक्रमेण वक्ष्यामि तानि सर्वाणि पार्थिव ॥
नरेश्वर! चौदह जन्म व्यर्थ समझे जाते हैं। क्रमशः पचपन प्रकारके दान निष्फल होते हैं और जिन-जिन मनुष्योंका जीवन निरर्थक होता है, उनकी संख्या छः बतलायी गयी है। भूपाल! इन सबका मैं क्रमशः वर्णन करूँगा॥

धर्मघ्नानां वृथा जन्म लुब्धानां पापिनां तथा ।
वृथा पाकं च येऽश्नन्ति परदाररताश्च ये ।
पाकभेदकरा ये च ये च स्युः सत्यवर्जिताः ॥
जो धर्मका नाश करनेवाले, लोभी, पापी, बलिवैश्वदेव किये बिना भोजन करनेवाले, परस्त्रीगामी, भोजनमें भेद करनेवाले और असत्यभाषी हैं, उनका जन्म वृथा है॥

मृष्टमश्नाति यश्चैकः क्लिश्यमानैस्तु बान्धवैः ।
पितरं मातरं चैव उपाध्यायं गुरुं तथा ।
मातुलं मातुलानीं च यो निहन्याच्छपेत वा ॥
ब्राह्मणश्चैव यो भूत्वा संध्योपासनवर्जितः ।
निःस्वाहो निःस्वधश्चैव शूद्राणामन्नभुग् द्विजः ॥
मम वा शंकरस्याथ ब्रह्मणो वा युधिष्ठिर ।
अथवा ब्राह्मणानां तु ये न भक्ता नराधमाः ।
वृथा जन्मान्यथैतेषां पापिनां विद्धि पाण्डव ॥
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! जो बन्धु-बान्धवोंको क्लेश देकर अकेले ही मिठाई खानेवाले हैं, जो माता-पिता, अध्यापक, गुरु और मामा-मामीको मारते या गाली देते हैं, जो ब्राह्मण होकर भी संध्योपासनसे रहित हैं, जो अग्निहोत्रका त्याग करनेवाले हैं, जो श्राद्ध-तर्पणसे दूर रहनेवाले हैं, जो ब्राह्मण होकर शूद्रका अन्न खानेवाले हैं तथा जो मेरे, शंकरजीके, ब्रह्माजीके अथवा ब्राह्मणोंके भक्त नहीं हैं—ये चौदह प्रकारके मनुष्य अधम होते हैं। इन्हीं पापियोंके जन्मको व्यर्थ समझना चाहिये॥

अश्रद्धयापि यद् दत्तमवमानेन वापि यत् ।