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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2068, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2068

कैसे हुई, यह सब बता रहा हूँ ॥ ४० ॥
श्राद्धं संकल्पयामास जमदग्निः पुरा किल ।
होमधेनुस्तमागाच्च स्वयमेव दुदोह ताम् ॥ ४१ ॥
पूर्वकालकी बात है, एक दिन जमदग्नि ऋषिने श्राद्ध करनेका संकल्प किया। उस समय उनकी होमधेनु स्वयं ही उनके पास आयी और मुनिने स्वयं ही उसका दूध दुहा ॥ ४१ ॥
तत् पयः स्थापयामास नवे भाण्डे दृढे शुचौ ।
तच्च क्रोधस्वरूपेण पिठरं धर्म आविशत् ॥ ४२ ॥
उस दूधको उन्होंने नये पात्रमें, जो सुदृढ़ और पवित्र था, रख दिया। उस पात्रमें धर्मने क्रोधका रूप धारण करके प्रवेश किया ॥ ४२ ॥
जिज्ञासुस्तमृषिश्रेष्ठं किं कुर्याद् विप्रिये कृते ।
इति संचिन्त्य धर्मः स धर्षयामास तत् पयः ॥ ४३ ॥
धर्म उन मुनिश्रेष्ठकी परीक्षा लेना चाहते थे। उन्होंने सोचा, देखूँ तो ये अप्रिय करनेपर क्या करते हैं? इसीलिये उन्होंने उस दूधको क्रोधके स्पर्शसे दूषित कर दिया ॥ ४३ ॥
तमाज्ञाय मुनिः क्रोधं नैवास्य स चुकोप ह ।
स तु क्रोधस्ततो राजन् ब्राह्मणीं मूर्त्तिमास्थितः ।
जिते तस्मिन् भृगुश्रेष्ठमभ्यभाषदमर्षणः ॥ ४४ ॥
राजन्! मुनिने उस क्रोधको पहचान लिया; किंतु उसपर वे कुपित नहीं हुए। तब क्रोधने ब्राह्मणका रूप धारण किया। मुनिके द्वारा पराजित होनेपर उस अमर्षशील क्रोधने उन भृगुश्रेष्ठसे कहा— ॥ ४४ ॥
जितोऽस्मीति भृगुश्रेष्ठ भृगवो ह्यतिरोषणाः ।
लोके मिथ्या प्रवादोऽयं यत्त्वयास्मि विनिर्जितः ॥ ४५ ॥
‘भृगुश्रेष्ठ! मैं तो पराजित हो गया। मैंने सुना था कि भृगुवंशी ब्राह्मण बड़े क्रोधी होते हैं; परंतु लोकमें प्रचलित हुआ यह प्रवाद आज मिथ्या सिद्ध हो गया; क्योंकि आपने मुझे जीत लिया ॥ ४५ ॥
वशे स्थितोऽहं त्वय्यद्य क्षमावति महात्मनि ।
बिभेमि तपसः साधो प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ ४६ ॥
‘प्रभो! आज मैं आपके वशमें हूँ। आपकी तपस्यासे डरता हूँ। साधो! आप क्षमाशील महात्मा हैं, मुझपर कृपा कीजिये’ ॥ ४६ ॥

जमदग्निरुवाच
साक्षाद् दृष्टोऽसि मे क्रोध गच्छ त्वं विगतज्वरः ।
न त्वयापकृतं मेऽद्य न च मे मन्युरस्ति वै ॥ ४७ ॥