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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2058, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2058

विधिदृष्टेन यज्ञेन धर्मस्ते सुमहान् भवेत् ।
‘यदि आपकी इच्छा हो तो ब्राह्मणलोग शास्त्रके अनुसार ही इस यज्ञका अनुष्ठान करें। शास्त्रीय विधिके अनुसार यज्ञ करनेसे आपको महान् धर्मकी प्राप्ति होगी ॥ १५ १/२ ॥
यज बीजैः सहस्राक्ष त्रिवर्षपरमोषितैः ॥ १६ ॥
एष धर्मो महान् शक्र महागुणफलोदयः ।
‘सहस्र नेत्रधारी इन्द्र! आप तीन वर्षके पुराने बीजों (जौ, गेहूँ आदि अनाजों)-से यज्ञ करें। यही महान् धर्म है और महान् गुणकारक फलकी प्राप्ति करानेवाला है’ ॥ १६ १/२ ॥
शतक्रतुस्तु तद् वाक्यमृषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १७ ॥
उक्तं न प्रतिजग्राह मानान्मोहवशं गतः ।
तत्त्वदर्शी ऋषियोंके कहे हुए इस वचनको इन्द्रने अभिमानवश नहीं स्वीकार किया। वे मोहके वशीभूत हो गये थे ॥ १७ १/२ ॥
तेषां विवादः सुमहान् शक्रयज्ञे तपस्विनाम् ॥ १८ ॥
जङ्गमैः स्थावरैर्वापि यष्टव्यमिति भारत ।
इन्द्रके उस यज्ञमें जुटे हुए तपस्वी लोगोंमें इस प्रश्नको लेकर महान् विवाद खड़ा हो गया। भारत! एक पक्ष कहता था कि जंगम पदार्थ (पशु आदि)-के द्वारा यज्ञ करना चाहिये और दूसरा पक्ष कहता था कि स्थावर वस्तुओं (अन्न-फल आदि)-के द्वारा यजन करना उचित है ॥ १८ १/२ ॥
ते तु खिन्ना विवादेन ऋषयस्तत्त्वदर्शिनः ॥ १९ ॥
तदा संधाय शक्रेण पप्रच्छुर्नृपतिं वसुम् ।
धर्मसंशयमापन्नान् सत्यं ब्रूहि महामते ॥ २० ॥
भरतनन्दन! वे तत्त्वदर्शी ऋषि जब इस विवादसे बहुत खिन्न हो गये, तब उन्होंने इन्द्रके साथ सलाह लेकर इस विषयमें राजा उपरिचर वसुसे पूछा—‘महामते! हमलोग धर्मविषयक संदेहमें पड़े हुए हैं। आप हमसे सच्ची बात बताइये ॥ १९-२० ॥
महाभाग कथं यज्ञेष्वागमो नृपसत्तम ।
यष्टव्यं पशुभिर्मुख्यैरथो बीजै रसैरिति ॥ २१ ॥
‘महाभाग नृपश्रेष्ठ! यज्ञोंके विषयमें शास्त्रका मत कैसा है? मुख्य-मुख्य पशुओंद्वारा यज्ञ करना चाहिये अथवा बीजों एवं रसोंद्वारा’ ॥ २१ ॥
तच्छ्रुत्वा तु वसुस्तेषामविचार्य बलाबलम् ।
यथोपनीतैर्यष्टव्यमिति प्रोवाच पार्थिवः ॥ २२ ॥
यह सुनकर राजा वसुने उन दोनों पक्षोंके कथनमें कितना सार या असार है, इसका विचार न करके यों ही बोल दिया कि ‘जब जो वस्तु मिल जाय, उसीसे यज्ञ कर लेना चाहिये’ ॥ २२ ॥
एवमुक्त्वा स नृपतिः प्रविवेश रसातलम् ।