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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2036, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2036

भक्ष्यखाण्डवरागाणां क्रियतां भुज्यतां तथा ।
पशूनां बध्यतां चैव नान्तं ददृशिरे जनाः ॥ ४१ ॥
(पीपल और सोंठ मिलाकर जो मूँगका जूस तैयार किया जाता है, उसे 'खाण्डव' कहते हैं। उसीमें शक्कर मिला हुआ हो तो वह 'खाण्डवराग' कहा जाता है।) भक्ष्य-भोज्य पदार्थ और खाण्डवराग कितनी मात्रामें बनाये और खाये जाते हैं तथा कितने पशु वहाँ बाँधे हुए थे, इसकी कोई सीमा वहाँके लोगोंको नहीं दिखायी देती थी ॥ ४१ ॥

मत्तप्रमत्तमुदितं सुप्रीतयुवतीजनम् ।
मृदङ्गशङ्खनादैश्च मनोरममभूत् तदा ॥ ४२ ॥
उस यज्ञके भीतर आये हुए सब लोग मत्त-प्रमत्त और आनन्द विभोर हो रहे थे। युवतियाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ विचरण करती थीं। मृदंगों और शंखोंकी ध्वनियोंसे उस यज्ञशालाकी मनोरमता और भी बढ़ गयी थी ॥ ४२ ॥

दीयतां भुज्यतां चेष्टं दिवारात्रमवारितम् ।
तं महोत्सवसंकाशं हृष्टपुष्टजनाकुलम् ॥ ४३ ॥
कथयन्ति स्म पुरुषा नानादेशनिवासिनः ।
‘जिसकी जैसी इच्छा हो, उसको वही वस्तु दी जाय। सबको इच्छानुसार भोजन कराया जाय’—यह घोषणा दिन-रात जारी रहती थी—कभी बंद नहीं होती थी। हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए उस यज्ञ-महोत्सवकी चर्चा नाना देशोंके निवासी मनुष्य बहुत दिनोंतक करते रहे ॥ ४३ १/२ ॥

वर्षित्वा धनधाराभिः कामै रत्नै रसैस्तथा ।
विपाप्मा भरतश्रेष्ठः कृतार्थः प्राविशत् पुरम् ॥ ४४ ॥
भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने उस यज्ञमें धनकी मूसलाधार वर्षा की। सब प्रकारकी कामनाओं, रत्नों और रसोंकी भी वर्षा की। इस प्रकार पापरहित और कृतार्थ होकर उन्होंने अपने नगरमें प्रवेश किया ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधसमाप्तौ
एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधकी समाप्तिविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥