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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1687, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1687

परंतु तुम मुझसे वाणी और मनके विषयमें ही प्रश्न करती हो, इसलिये मैं तुम्हें उन्हीं दोनोंका संवाद बताऊँगा ।। १३ ।।
उभे वाङ्मनसी गत्वा भूतात्मानमपृच्छताम् ।
आवयोः श्रेष्ठमाचक्ष्व छिन्धि नौ संशयं विभो ।। १४ ।।
मन और वाणी दोनोंने जीवात्माके पास जाकर पूछा—'प्रभो! हम दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? यह बताओ और हमारे संदेहका निवारण करो' ।। १४ ।।
मन इत्येव भगवांस्तदा प्राह सरस्वती ।
अहं वै कामधुक् तुभ्यमिति तं प्राह वागथ ।। १५ ।।
तब भगवान् आत्मदेवने कहा—'मन ही श्रेष्ठ है।' यह सुनकर सरस्वती बोलीं—'मैं ही तुम्हारे लिये कामधेनु बनकर सब कुछ देती हूँ।' इस प्रकार वाणीने स्वयं ही अपनी श्रेष्ठता बतायी ।। १५ ।।

ब्राह्मण उवाच

स्थावरं जङ्गमं चैव विद्धयुभे मनसी मम ।
स्थावरं मत्सकाशे वै जङ्गमं विषये तव ।। १६ ।।
**ब्राह्मण देवता कहते हैं—**प्रिये! स्थावर और जंगम ये दोनों मेरे मन हैं। स्थावर अर्थात् बाह्य इन्द्रियोंसे गृहीत होनेवाला जो यह जगत् है, वह मेरे समीप है और जंगम अर्थात् इन्द्रियातीत जो स्वर्ग आदि है, वह तुम्हारे अधिकारमें है ।। १६ ।।
यस्तु तं विषयं गच्छेन्मन्त्रो वर्णः स्वरोऽपि वा ।
तन्मनो जङ्गमो नाम तस्मादसि गरीयसी ।। १७ ।।
जो मन्त्र, वर्ण अथवा स्वर उस अलौकिक विषयको प्रकाशित करता है, उसका अनुसरण करनेवाला मन भी यद्यपि जंगम नाम धारण करता है तथापि वाणीस्वरूपा तुम्हारे द्वारा ही मनका उस अतीन्द्रिय जगत्में प्रवेश होता है। इसलिये तुम मनसे भी श्रेष्ठ एवं गौरवशालिनी हो ।। १७ ।।
यस्मादपि समाधिस्ते स्वयमभ्येस्त शोभने ।
तस्मादुच्छ्वासमासाद्य प्रवक्ष्यामि सरस्वति ।। १८ ।।
क्योंकि शोभामयी सरस्वति! तुमने स्वयं ही पास आकर समाधान अर्थात् अपने पक्षकी पुष्टि की है। इससे मैं उच्छ्वास लेकर कुछ कहूँगा ।। १८ ।।
प्राणापानान्तरे देवी वाग् वै नित्यं स्म तिष्ठति ।
प्रेर्यमाणा महाभागे विना प्राणमपानती ।
प्रजापतिमुपाधावत् प्रसीद भगवन्निति ।। १९ ।।
महाभागे! प्राण और अपानके बीचमें देवी सरस्वती सदा विद्यमान रहती हैं। वह प्राणकी सहायताके बिना जब निम्नतम दशाको प्राप्त होने लगी, तब दौड़ी हुई प्रजापतिके