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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1643, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1643

स्थावर (वृक्ष) बहुत-से फूलोंसे सुशोभित तथा फल और छाया देनेवाले होते थे। उनका स्पर्श सुखद जान पड़ता था और वे विषसे हीन तथा सुन्दर पत्र, छाल और अंकुरसे युक्त होते थे॥

मनोऽनुकूलाः सर्वेषां चेष्टा भूस्तापवर्जिता ।
यथा बभूव राजर्षिस्तद्वृत्तमभवद् भुवि ॥
सबकी चेष्टाएँ मनके अनुकूल होती थीं। पृथ्वीपर किसी प्रकारका संताप नहीं होता था। राजर्षि युधिष्ठिर स्वयं जैसे आचार-विचारसे युक्त थे, उसीका भूतलपर प्रसार हुआ था॥

सर्वलक्षणसम्पन्नाः पाण्डवा धर्मचारिणः ।
ज्येष्ठानुवर्तिनः सर्वे बभूवुः प्रियदर्शनाः ॥
समस्त पाण्डव सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, धर्माचरण करनेवाले और बड़े भाईकी आज्ञाके अधीन रहनेवाले थे। उनका दर्शन सभीको प्रिय था॥

सिंहोरस्का जितक्रोधास्तेजोबलसमन्विताः ।
आजानुबाहवः सर्वे दानशीला जितेन्द्रियाः ॥
उनकी छाती सिंहके समान चौड़ी थी। वे क्रोधपर विजय पानेवाले और तेज एवं बलसे सम्पन्न थे। उन सबकी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं। वे सभी दानशील एवं जितेन्द्रिय थे॥

तेषु शासत्सु धरणीमृतवः स्वगुणैर्बभुः ।
सुखोदयाय वर्तन्ते ग्रहास्तारागणैः सह ॥
पाण्डव जब इस पृथ्वीका शासन कर रहे थे, उस समय सभी ऋतुएँ अपने गुणोंसे सुशोभित होती थीं। ताराओंसहित समस्त ग्रह सबके लिये सुखद हो गये थे॥

मही सस्यप्रबहुला सर्वरत्नगुणोदया ।
कामधुग्धेनुवद् भोगान् फलति स्म सहस्रधा ॥
पृथ्वीपर खेतीकी उपज बढ़ गयी थी। सभी रत्न और गुण प्रकट हो गये थे। कामधेनुके समान वह सहस्रों प्रकारके भोगरूप फल देती थी॥

मन्वादिभिः कृताः पूर्वं मर्यादा मानवेषु याः ।
अनतिक्रम्य ताः सर्वाः कुलेषु समयानि च ।
अन्वशासन्त राजानो धर्मपुत्रप्रियंकराः ॥
पूर्वकालमें मनु आदि राजर्षियोंने मनुष्योंमें जो मर्यादाएँ स्थापित की थीं, उन सबका तथा कुलोचित सदाचारोंका उल्लंघन न करते हुए भूमण्डलके सभी राजा अपने-अपने राज्यका शासन करते थे। इस प्रकार सभी भूपाल धर्मपुत्र युधिष्ठिरका प्रिय करनेवाले थे॥

महाकुलानि धर्मिष्ठा वर्धयन्तो विशेषतः ।
मनुप्रणीतया कृत्या तेऽन्वशासन् वसुन्धराम् ॥