महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1622, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वं स्वं धिष्ण्यं चैव जुषन्तु देवा
हुतं सोमं प्रतिगृह्णन्तु चैव ॥ १८ ॥
मरुत्तने कहा— ब्रह्मर्षे! आप ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे साक्षात् इन्द्र मेरे यज्ञमें शीघ्रतापूर्वक पधारें और अपना हविष्य-भाग ग्रहण करें। साथ ही अन्य देवता भी अपने-अपने स्थानपर आकर बैठ जायँ और सब लोग एक साथ आहुतिरूपमें प्राप्त हुए सोमरसका पान करें ॥ १८ ॥
संवर्त उवाच
अयमिन्द्रो हरिभिरायाति राजन्
देवैः सर्वैस्त्वरितैः स्तूयमानः ।
मन्त्राहूतो यज्ञमिमं मयाद्य
पश्यस्वैनं मन्त्रविस्रस्तकायम् ॥ १९ ॥
(तदनन्तर संवर्तने अपने मन्त्रबलसे सम्पूर्ण देवताओंका आवाहन किया और) मरुत्तसे कहा— राजन्! ये इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके द्वारा अपनी स्तुति सुनते शीघ्रगामी अश्वोंसे युक्त रथकी सवारीसे आ रहे हैं। मैंने मन्त्रबलसे आज इस यज्ञमें इनका आवाहन किया है। देखो, मन्त्रशक्तिसे इनका शरीर इधर खिंचता चला आ रहा है ॥ १९ ॥
ततो देवैः सहितो देवराजो
रथे युङ्क्त्वा तान् हरीन् वाजिमुख्यान् ।
आयाद् यज्ञमथ राज्ञः पिपासु-
रावेक्षितस्याप्रमेयस्य सोमम् ॥ २० ॥
तत्पश्चात् देवराज इन्द्र अपने रथमें उन सफेद रंगके अच्छे घोड़ोंको जोतकर देवताओंको साथ ले सोमपानकी इच्छासे अनुपम पराक्रमी राजा मरुत्तकी यज्ञशालामें आ पहुँचे ॥ २० ॥
तमायान्तं सहितं देवसंघैः
प्रत्युद्ययौ सपुरोधा मरुत्तः ।
चक्रे पूजां देवराजाय चाग्र्यां
यथाशास्त्रं विधिवत् प्रीयमाणः ॥ २१ ॥
देववृन्दके साथ इन्द्रको आते देख राजा मरुत्तने अपने पुरोहित संवर्त मुनिके साथ आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और बड़ी प्रसन्नताके साथ शास्त्रीय विधिसे उनका अग्रपूजन किया ॥ २१ ॥
संवर्त उवाच
स्वागतं ते पुरुहूतेह विद्वन्
यज्ञोऽप्ययं संनिहिते त्वयीन्द्र ।