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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1573, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1573

शत्रुदमन श्रीकृष्ण! अब जिस कर्मके द्वारा मुझे अपने इस क्रूरतापूर्ण पापसे छुटकारा मिले तथा जिससे मेरा चित्त शुद्ध हो, वही कीजिये ।। १३ १/२ ।।
तमेवं वादिनं पार्थं व्यासः प्रोवाच धर्मवित् ।। १४ ।।
सान्त्वयन् सुमहातेजाः शुभं वचनमर्थवत् ।
अकृता ते मतिस्तात पुनर्बाल्येन मुह्यसे ।। १५ ।।
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको ऐसी बातें करते देख धर्मके तत्त्वको जाननेवाले महातेजस्वी व्यासजीने उन्हें सान्त्वना देते हुए यह शुभ एवं सार्थक वचन कहा—‘तात! तुम्हारी बुद्धि अभी शुद्ध नहीं हुई है। तुम पुनः बालकोचित अविवेकके कारण मोहमें पड़ गये ।। १४-१५ ।।
किमाकारा वयं तात प्रलपामो मुहुर्मुहुः ।
विदिताः क्षत्रधर्मास्ते येषां युद्धेन जीविका ।। १६ ।।
‘तात! अब हमलोग किस लायक रह गये। हम बारंबार जो कुछ कहते या समझाते हैं वह सब व्यर्थका प्रलाप सिद्ध हो रहा है। युद्धसे ही जिनकी जीविका चलती है, उन क्षत्रियोंके धर्म भलीभाँति तुम्हें विदित हैं ।। १६ ।।
तथाप्रवृत्तो नृपतिर्नाधिबन्धेन युज्यसे ।
मोक्षधर्माश्च निखिला याथातथ्येन ते श्रुताः ।। १७ ।।
‘उनके अनुसार बर्ताव करनेवाला राजा कभी मानसिक चिन्तासे ग्रस्त नहीं होता। तुमने सम्पूर्ण मोक्षधर्मोंको भी यथार्थरूपसे सुना है ।। १७ ।।
(यथा वै कामजां मायां परित्यक्तुं त्वमर्हसि ।
तथा तु कुर्वन् नृपतिर्नानुबन्धेन युज्यते ।।)
‘तुम्हें कामजनित मायाका जिस प्रकार परित्याग करना चाहिये, उस प्रकार उसका त्याग करनेवाला नरेश कभी बन्धनमें नहीं पड़ता ।।
असकृच्चापि संदेहाश्छिन्नास्ते कामजा मया ।
अश्रद्दधानो दुर्मेधा लुप्तस्मृतिरसि ध्रुवम् ।। १८ ।।
‘मैंने अनेक बार तुम्हारे कामजनित संदेहोंका निवारण किया है; परंतु तुम दुर्बुद्धि होनेके कारण उसपर श्रद्धा नहीं करते। निश्चय इसलिये तुम्हारी स्मरणशक्ति लुप्त हो गयी है ।। १८ ।।
मैवं भव न ते युक्तमिदमज्ञानमीदृशम् ।
प्रायश्चित्तानि सर्वाणि विदितानि च तेऽनघ ।
राजधर्माश्च ते सर्वे दानधर्माश्च ते श्रुताः ।। १९ ।।
‘तुम ऐसे न बनो, तुम्हारे लिये इस तरह अज्ञानका अवलम्बन उचित नहीं है। निष्पाप नरेश! तुम्हें सब प्रकारके प्रायश्चित्तोंका भी ज्ञान है। तुमने सब प्रकारके राजधर्म और दानधर्म भी सुने हैं ।। १९ ।।