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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 150

‘जो अपनी महिमासे कभी च्युत नहीं होते, हिमके समान शीतल हैं, जिनमें वीरत्व है, जो सर्वत्र समभावसे स्थित हैं, विजयशील हैं, जिन्हें बहुत लोग पुकारते हैं अथवा जो इन्द्ररूप हैं तथा जो सर्वश्रेष्ठ वसिष्ठ हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है ।।
सत्येशाय सुरेशाय हरयेऽथ शिखण्डिने ।।
बर्हिषाय वरेण्याय वसवे विश्ववेधसे ।
‘जो सत्य और देवताओंके स्वामी हैं, हरि (श्यामसन्दर) और शिखण्डी (मोरमुकुटधारी) हैं, जो कुशापर बैठनेवाले सर्वश्रेष्ठ वसुरूप हैं, उन विश्वस्रष्टा भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।।
किरीटिने सुकेशाय वासुदेवाय शुष्मिणे ।।
बृहदुक्थसुषेणाय युग्ये दुन्दुभये तथा ।
‘जो किरीटधारी, सुन्दर केशोंसे सुशोभित तथा पराक्रमी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णरूप हैं, बृहदुक्थ साम जिनका स्वरूप है, जो सुन्दर सेनासे युक्त हैं, जुएका भार सँभालनेवाले वृषभरूप हैं तथा दुन्दुभि नामक वाद्यविशेष हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है ।।
भवेसखाय विभवे भरद्वाजाभयाय च ।।
भास्कराय वरेन्द्राय पद्मनाभाय भूरिणे ।
‘जो इस जगत्‌में जीवमात्रके सखा हैं, व्यापकरूप हैं, भरद्वाजको अभय देनेवाले हैं, सूर्यरूपसे प्रभाका विस्तार करनेवाले हैं, श्रेष्ठ पुरुषोंके स्वामी हैं, जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है और जो महान् हैं, उन भगवान् नारायणको नमस्कार है ।।
पुनर्वसुभृतत्वाय जीवप्रभविषाय च ।।
वषट्काराय स्वाहायै स्वधायै निधनाय च ।
ऋचे च यजुषे साम्ने त्रैलोक्यपतये नमः ।।
‘जो पुनर्वसु नामक नक्षत्रसे पालित और जीवमात्रकी उत्पत्तिके स्थान हैं, वषट्कार, स्वाहा, स्वधा और निधन—ये जिनके ही नाम और रूप हैं तथा जो ऋक्‌, यजुष्‌, सामवेद-स्वरूप हैं और त्रिलोकीके अधिपति हैं, उन भगवान् विष्णुको मेरा प्रणाम है ।।
श्रीपद्मायात्मसदृशे धरणे धारणे परे ।
सौम्याय सौम्यरूपाय सौम्ये सुमनसे नमः ।।
‘जो शोभाशाली कमलको हाथमें लिये रहते हैं, जो अपने समान स्वयं ही हैं, जो धारण करने और करानेवाले परम पुरुष हैं, जो सौम्य, सौम्यरूपधारी तथा सौम्य एवं सुन्दर मनवाले हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार है ।।
विश्वाय च सुविश्वाय विश्वरूपधराय च ।
केशवाय सुकेशाय रश्मिकेशाय भूरिणे ।।
‘जो विश्वरूप, सुन्दर विश्वके निर्माता तथा विश्वरूपधारी हैं, जो केशव, सुन्दर केशोंसे युक्त किरणरूपी केशवाले और अधिक बलशाली हैं, उन भगवान् विष्णुको मेरा प्रणाम