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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 147

मैं उसी शब्दका अनुसरण करता हुआ उस स्थानपर जा पहुँचा। वहाँ मैंने एक सुन्दर सरोवर देखा जिसमें बहुत-से हंस शोभा पा रहे थे ॥
स तत्सरः समासाद्य भगवानात्मवित्त्तमः ।
भोःशब्दप्रतिसृष्टेन स्वरेणाप्रतिवादिना ॥
विवेश देवः स्वां योनिं मामिदं चाभ्यभाषत ।
आत्मतत्त्वके ज्ञाताओंमें सर्वोत्तम भगवान् नारायण उस सरोवरके पास पहुँचकर 'भो' शब्दसे युक्त अनुपम गम्भीर स्वरसे मुझे पुकारते हुए अपने शयन-स्थान जलमें प्रविष्ट हो गये और मुझसे इस प्रकार बोले— ॥

श्रीभगवानुवाच
विशस्व सलिलं सौम्य सुखमत्र वसामहे ।
**श्रीभगवान्ने कहा—**सौम्य! तुम भी जलमें प्रवेश करो। हम दोनों यहाँ सुखसे रहेंगे ॥

सुपर्ण उवाच
ततश्च प्राविशं तत्र सह तेन महात्मना ।
दृष्टवानद्भुततरं तस्मिन् सरसि भास्वताम् ॥
अग्नीनां सुप्रणीतानामिद्धानामिन्धनैर्विना ।
दीप्तानामाज्यसिक्तानां स्थानेष्वार्चिष्मतां सदा ॥
**गरुड कहते हैं—**ऋषियो! तब मैं उन महात्मा श्रीहरिके साथ उस सरोवरमें घुसा। वहाँ मैंने अत्यन्त अद्भुत दृश्य देखा। भिन्न-भिन्न स्थानोंपर विधिपूर्वक स्थापित की हुई प्रज्वलित अग्नयाँ बिना ईंधनके ही जल रही थीं और घीकी आहुति पाकर उद्दीप्त हो उठी थीं ॥

दीप्तिस्तेषामनाज्यनां प्राप्ताज्यानामिवाभवत् ।
अनिद्धानामिव सतामिद्धानामिव भास्वताम् ॥
घी न मिलनेपर भी उन अग्नियोंकी दीप्ति घीकी आहुति पायी हुई अग्नियोंके समान थी और बिना ईंधनके भी ईंधनयुक्त आगके तुल्य उनकी प्रभा प्रकाशित होती रहती थी ॥

अथाहं वरदं देवं नापश्यं तत्र सङ्गतम् ।
वहाँ जानेपर भी उन वरदायक देवता नारायण-देवका मुझे दर्शन न हो सका ॥

तेषां तत्राग्निहोत्राणामीडितानां सहस्रशः ॥
समीपे त्वद्भुततममपश्यमहमव्ययम् ॥
सहस्रों स्थानोंमें प्रशंसित होनेवाले उन अग्निहोत्रोंके समीप मैंने उन अद्भुत एवं अविनाशी श्रीहरिको ढूँढ़ना आरम्भ किया ॥

एषु चाग्निसमीपेषु शुश्राव सुपदाक्षराः ॥
प्रभावान्तरितानां तु प्रस्पष्टाक्षरभाषिणाम् ।