महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवे श्रीवत्सनिलये तच्छृणुध्वमशेषतः ॥
मैंने पूर्वकालमें श्रीवत्सचिह्नके आश्रयभूत सनातन-देव श्रीहरिके विषयमें जो महान् आश्चर्यकी बात देखी है, वह सब बताता हूँ, सुनिये ॥
न स्म शक्यो मया वेत्तुं न भवद्भिः कथंचन ॥
यथा मां प्राह भगवांस्तथा तच्छ्रूयतां मम ।
मैं या आपलोग कोई भी किसी तरह भगवान्के यथार्थ स्वरूपको नहीं जान सकते। भगवान्ने स्वयं ही अपने विषयमें मुझसे जो कुछ जैसा कहा है, वह उसी रूपमें सुनिये ॥
मयामृतं देवतानां मिषतामृषिसत्तमाः ॥
हृतं विपाट्य तं यन्त्रं विद्राव्यामृतरक्षिणः ।
देवता विमुखीकृत्य सेन्द्राः समरुतो मृधे ॥
तं दृष्ट्वा मम विक्रान्तं वागुवाचाशरीरिणी ।
मुनिश्रेष्ठगण! मैंने देवताओंके देखते-देखते उनके रक्षायन्त्रको विदीर्ण करके अमृतके रक्षकोंको खदेड़कर युद्धमें इन्द्र और मरुद्गणोंसहित सम्पूर्ण देवताओंको पराजित करके शीघ्र ही अमृतका अपहरण कर लिया। मेरे उस पराक्रमको देखकर आकाशवाणीने कहा ॥
अशरीरिणी वागुवाच
प्रीतोऽस्मि ते वैनतेय कर्मणानेन सुव्रत ।
अवृथा तेऽस्तु मद्वाक्यं ब्रूहि किं करवाणि ते ॥
**आकाशवाणी बोली—**उत्तम व्रतका पालन करनेवाले विनतानन्दन! मैं तुम्हारे इस पराक्रमसे बहुत प्रसन्न हूँ। मेरी यह वाणी व्यर्थ नहीं जानी चाहिये; इसलिये बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करूँ? ॥
सुपर्ण उवाच
तामेवंवादिनीं वाचमहं प्रत्युक्तवांस्तदा ।
ज्ञातुमिच्छामि कस्त्वं हि ततो मे दास्यसे वरम् ॥
**गरुड कहते हैं—**ऋषिगण! आकाशवाणीकी ऐसी बात सुनकर मैंने उस समय यों उत्तर दिया—'पहले मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप कौन हैं? फिर मुझे वर दीजियेगा' ॥
ततो जलदगम्भीरं प्रहस्य गदतां वरः ।
उवाच वरदः प्रीतः काले त्वं माभिवेत्स्यसि ॥
तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ वरदायक भगवान्ने बड़े जोरसे हँसकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें प्रसन्नतापूर्वक कहा—'समय आनेपर मेरे विषयमें तुम सब कुछ जान लोगे ॥
वाहनं भव मे साधु वरं दद्मि तवोत्तमम् ।
न ते वीर्येण सदृशः कश्चिल्लोके भविष्यति ॥
पतङ्ग पततां श्रेष्ठ न देवो नापि दानवः ।