महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरमात्माविकाराद्य नारायण नमोऽस्तु ते ॥
भक्तवत्सल! कमलनयन! परमेश्वर! पापहारी परमात्मन्! निर्विकार! आदिपुरुष! नारायण! आपको नमस्कार है ॥
नमस्ते सर्वलोकादे सर्वात्मामितविक्रम ।
सर्वभूतभविष्येश सर्वभूतमहेश्वर ॥
सम्पूर्ण लोकोंके आदिकारण! सर्वात्मन्! अमित पराक्रमी नारायण! सम्पूर्ण भूत और भविष्यके स्वामी! सर्वभूतमहेश्वर! आपको नमस्कार है ॥
देवानामपि देवस्त्वं सर्वविद्यापरायणः ।
जगद्वीजसमाहार जगतः परमो ह्यसि ॥
प्रभो! आप देवताओंके भी देवता और समस्त विद्याओंके परम आश्रय हैं। जगत्के जितने भी बीज हैं, उन सबका संग्रह करनेवाले आप ही हैं। आप ही जगत्के परम कारण हैं ॥
त्रायस्व देवता वीर दानवाद्यैः सुपीडिताः ।
लोकांश्च लोकपालांश्च ऋषींश्च जयतां वर ॥
वीर! ये देवता दानव, दैत्य आदिसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे हैं। आप इनकी रक्षा कीजिये। विजयशीलोंमें सबसे श्रेष्ठ नारायणदेव! आप लोकों, लोकपालों तथा ऋषियोंका संरक्षण कीजिये ॥
वेदाः साङ्गोपनिषदः सरहस्याः ससंग्रहाः ।
सोङ्काराः सवषट्काराः प्राहुस्त्वां यज्ञमुत्तमम् ॥
सम्पूर्ण अंगों और उपनिषदोंसहित वेद, उनके रहस्य, संग्रह, ॐकार और वषट्कार आपहीको उत्तम यज्ञका स्वरूप बताते हैं ॥
पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
तपस्विनां तपश्चैव दैवतं देवतास्वपि ॥
आप पवित्रोंके भी पवित्र, मंगलोंके भी मंगल, तपस्वियोंके तप और देवताओंके भी देवता हैं ॥
भीष्म उवाच
एवमादिपुरस्कारैर्ऋक्सामयजुषां गणैः ।
वैकुण्ठं तुष्टुवुर्देवाः समेत्य ब्रह्मणा सह ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार ब्रह्मासहित देवताओंने एकत्र होकर ऋक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रोंद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति की ॥
ततोऽन्तरिक्षे वागासीन्मेघगम्भीरनिःस्वना ।
जेष्यध्वं दानवान् यूयं मयैव सह सङ्गरे ॥