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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1368, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1368

इति बालश्चिन्तयति अन्तरायं न बुध्यते ।।
इदं मे स्यादिदं मे स्यादित्येवं मनसा नराः ।
अनवाप्तेषु कामेषु ह्रियन्ते मरणं प्रति ।।
कालपाशेन बद्धानामह्न्यहनि जीर्यताम् ।
का श्रद्धा प्राणिनां मार्गे विषमे भ्रमतां सदा ।।
युवैव धर्मशीलः स्यादनिमित्तं हि जीवितम् ।
फलानामिव पक्वानां सदा हि पतनाद् भयम् ।।
अविवेकी मनुष्य यह सोचता रहता है कि आगामी बरसातमें यह कार्य करूँगा और गर्मी तथा वसन्त ऋतुमें अमुक कार्य आरम्भ करूँगा; परंतु उसमें जो मौत विघ्न बनकर खड़ी रहती है, उसकी ओर उसका ध्यान नहीं जाता है। 'मेरे पास यह हो जाय, वह हो जाय' इस प्रकार मन-ही-मन मनुष्य मनसूबे बाँधा करता है। उसकी कामनाएँ अप्राप्त ही रह जाती हैं और वह मृत्युकी ओर खिंचता चला जाता है। कालके बन्धनमें बँधकर प्रतिदिन जीर्ण होते और विषम-मार्गमें भटकते हुए प्राणियोंका इस जीवनपर क्या विश्वास हो सकता है। युवावस्थासे ही मनुष्य धर्मशील हो; क्योंकि जीवनका कोई सुदृढ़ निमित्त नहीं है। इसे पके हुए फलोंकी भाँति सदा ही पतनका भय बना रहता है ।।
मर्त्यस्य किमु तैर्दारैः पुत्रैर्भोगैः प्रियैरपि ।
एकाह्ना सर्वमुत्सृज्य मृत्योस्तु वशमन्वियात् ।।
मनुष्यको उन स्त्रियों, पुत्रों और प्रिय भोगोंसे भी क्या प्रयोजन है, जब कि वह एक ही दिनमें सबको छोड़कर मृत्युकी ओर चला जाता है ।।
जायमानांश्च सम्प्रेक्ष्य म्रियमाणांस्तथैव च ।
न संवेगोऽस्ति चेत् पुंसः काष्ठलोष्टसमो हि सः ।।
विनाशिनो ह्यध्रुवजीवितस्य
किं बन्धुभिर्मित्रपरिग्रहैश्च ।
विहाय यद् गच्छति सर्वमेवं
क्षणेन गत्वा न निवर्तते च ।।
संसारमें जन्म लेने और मरनेवालोंको देखकर भी यदि मनुष्यको वैराग्य नहीं होता तो वह चेतन नहीं, काठ और मिट्टीके ढेलेके समान जड है। जो विनाशशील है, जिसका जीवन निश्चित नहीं है, ऐसे पुरुषको बन्धुओं और मित्रोंके संग्रहसे क्या प्रयोजन है? क्योंकि वह सबको क्षणभरमें छोड़कर चल देता है और जाकर फिर कभी लौटता नहीं है ।।
एवं चिन्तयतो नित्यं सर्वार्थानामनित्यताम् ।
उद्वेगो जायते शीघ्रं निर्वाणस्य परस्परम् ।।
तेनोद्वेगेन चाप्यस्य विमर्शो जायते पुनः ।
विमर्शो नाम वैराग्यं सर्वद्रव्येषु जायते ।।