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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1360, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1360

और स्तुति समान है, जो मौन रहता है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझता है तथा जिसका शत्रु और मित्रके प्रति समभाव है, वह निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त होता है ।।

एवंयुक्तसमाचारस्तत्परोऽध्यात्मचिन्तकः ।
ज्ञानाभ्यासेन तेनैव प्राप्नोति परमां गतिम् ।।
ऐसे आचरणसे युक्त, तत्पर और अध्यात्मचिन्तनशील यति उसी ज्ञानाभ्याससे परमगतिको प्राप्त कर लेता है ।।

अनुद्विग्नमतेर्जन्तोरस्मिन् संसारमण्डले ।
शोकव्याधिजरादुःखैर्निर्वाणं नोपपद्यते ।।
तस्मादुद्वेगजननं मनोऽवस्थापनं तथा ।
ज्ञानं ते सम्प्रवक्ष्यामि तन्मूलममृतं हि वै ।।
इस संसार-मण्डलमें जिस प्राणीकी बुद्धि उद्वेगशून्य है, वह शोक, व्याधि और वृद्धावस्थाके दुःखोंसे मुक्त हो निर्वाणको प्राप्त होता है। इसलिये संसारसे वैराग्य उत्पन्न करानेवाले और मनको स्थिर रखनेवाले ज्ञानका तुम्हारे लिये उपदेश करूँगा; क्योंकि अमृत (मोक्ष) का मूल कारण ज्ञान ही है ।।

शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ।।
शोकके सहस्रों और भयके सैकड़ों स्थान हैं। वे मूर्ख मनुष्यपर ही प्रतिदिन प्रभाव डालते हैं, विद्वान्पर नहीं ।।

नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते ।
अहो दुःखमिति ध्यायन् शोकस्य पदमाव्रजेत् ।।
धन नष्ट हो जाय अथवा स्त्री, पुत्र या पिताकी मृत्यु हो जाय, तो ‘अहो! मुझपर बड़ा भारी दुःख आ गया।' ऐसा सोचता हुआ मनुष्य शोकके आश्रयमें आ जाता है ।।

द्रव्येषु समतीतेषु ये शुभास्तान् न चिन्तयेत् ।
ताननाद्रियमाणस्य शोकबन्धः प्रणश्यति ।।
किसी भी द्रव्यके नष्ट हो जानेपर जो उसके शुभ गुण हैं, उनका चिन्तन न करे। उन गुणोंका आदर न करनेवाले पुरुषके शोकका बन्धन नष्ट हो जाता है ।।

सम्प्रयोगादनिष्टस्य विप्रयोगात् प्रियस्य च ।
मानुषा मानसैर्दुःखैः संयुज्यन्तेऽल्पबुद्धयः ।।
अप्रिय वस्तुका संयोग और प्रिय वस्तुका वियोग प्राप्त होनेपर अल्पबुद्धि मनुष्य मानसिक दुःखोंसे संयुक्त हो जाते हैं ।।

मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति ।
संतापेन च युज्येत तच्चास्य न निवर्तते ।।
उत्पन्नमिह मानुष्ये गर्भप्रभृति मानवम् ।