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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1316, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1316

वे जो-जो काम कराना चाहें, उनकी आज्ञाके अधीन रहकर वह सब कुछ करना चाहिये। वेदोंकी आज्ञाके समान गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन अभीष्ट माना गया है ।।
कलहांश्च विवादांश्च गुरुभिः सह वर्जयेत् ।
कैतवं परिहासांश्च मन्युकामाश्रयांस्तथा ॥
गुरुजनोंके साथ कलह और विवाद छोड़ दे, उनके साथ छल-कपट, परिहास तथा काम-क्रोधके आधारभूत बर्ताव भी न करे ।।
गुरूणां योऽनहंवादी करोत्याज्ञामतन्द्रितः ।
न तस्मात् सर्वमर्त्येषु विद्यते पुण्यकृत्तमः ॥
जो आलस्य और अहंकार छोड़कर गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करता है, समस्त मनुष्योंमें उससे बढ़कर पुण्यात्मा दूसरा कोई नहीं है ।।
असूयामपवादं च गुरूणां परिवर्जयेत् ।
तेषां प्रियहितान्वेषी भूत्वा परिचरेत् सदा ॥
गुरुजनोंके दोष देखना और उनकी निन्दा करना छोड़ दे, उनके प्रिय और हितका ध्यान रखते हुए सदा उनकी परिचर्या करे ।।
न तद् यज्ञफलं कुर्यात् तपो वाऽऽचरितं महत् ।
यत् कुर्यात् पुरुषस्येह गुरुपूजा सदा कृता ॥
यज्ञोंका फल और किया हुआ महान् तप भी इस जगत्में मनुष्यको वैसा लाभ नहीं पहुँचा सकता, जैसा सदा किया हुआ गुरुपूजन पहुँचा सकता है ।।
अनुवृत्तेर्विना धर्मो नास्ति सर्वाश्रमेष्वपि ।
तस्मात् क्षमावृतः क्षान्तो गुरुवृत्तिं समाचरेत् ॥
सभी आश्रमोंमें अनुवृत्ति (गुरुसेवा) के बिना कोई भी धर्म सफल नहीं हो सकता। इसलिये क्षमासे युक्त और सहनशील होकर गुरुसेवा करे ।।
स्वमर्थं स्वशरीरं च गुर्वर्थे संत्यजेद् बुधः ।
विवादं धनहेतोर्वा मोहाद् वा तैर्न रोचयेत् ॥
विद्वान् पुरुष गुरुके लिये अपने धन और शरीरको समर्पण कर दे। धनके लिये अथवा मोहवश उनके साथ विवाद न करे ।।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च दानानि विविधानि च ।
गुरुभिः प्रतिषिद्धस्य सर्वमेतदपार्थकम् ॥
जो गुरुजनोंसे अभिशप्त है, उसके किये हुए ब्रह्मचर्य, अहिंसा और नाना प्रकारके दान—ये सब व्यर्थ हो जाते हैं ।।
उपाध्यायं पितरं मातरं च
येऽभिद्रुह्युर्मनसा कर्मणा वा ।
तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं