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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1231, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1231

अपनी प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखावे। राज्यमें स्थित रहकर प्रजाके पालनमें तत्पर रहे। लोभशून्य होकर न्याययुक्त बात कहे और प्रजाकी आयका छठा भागमात्र लेकर जीवन-निर्वाह करे ।।

कार्याकार्यविशेषज्ञः सर्वं धर्मेण पश्यति ।
स्वराष्ट्रेषु दयां कुर्यादकार्ये न प्रवर्तते ।।
कर्तव्य-अकर्तव्यको समझे। सबको धर्मकी दृष्टिसे देखे! अपने राष्ट्रके निवासियोंपर दया करे और कभी न करने योग्य कर्ममें प्रवृत्त न हो ।।

ये चैवैनं प्रशंसन्ति ये च निन्दन्ति मानवाः ।
शत्रुं च मित्रवत् पश्येदपराधविवर्जितम् ।।
जो मनुष्य राजाकी प्रशंसा करते हैं और जो उसकी निन्दा करते हैं, इनमेंसे शत्रु भी यदि निरपराध हो तो उसे मित्रके समान देखे ।।

अपराधानुरूपेण दुष्टं दण्डेन शासयेत् ।
धर्मः प्रवर्तते तत्र यत्र दण्डरुचिर्नृपः ।।
दुष्टको अपराधके अनुसार दण्ड देकर उसका शासन करे। जहाँ राजा न्यायोचित दण्डमें रुचि रखता है, वहाँ धर्मका पालन होता है ।।

नाधर्मो विद्यते तत्र यत्र राजाक्षमान्वितः ।।
अशिष्टशासनं धर्मः शिष्टानां परिपालनम् ।
जहाँ राजा क्षमाशील न हो, वहाँ अधर्म नहीं होता। अशिष्ट पुरुषोंको दण्ड देना और शिष्ट पुरुषोंका पालन करना राजाका धर्म है ।।

वध्यांश्च घातयेद् यस्तु अवध्यान् परिरक्षति ।।
अवध्या ब्राह्मणा गावो दूताश्चैव पिता तथा ।
विद्यां ग्राहयते यश्च ये च पूर्वोपकारिणः ।।
स्त्रियश्चैव न हन्तव्या यश्च सर्वातिथिर्नरः ।।
राजा वधके योग्य पुरुषोंका वध करे और जो वधके योग्य न हों, उनकी रक्षा करे। ब्राह्मण, गौ, दूत, पिता, जो विद्या पढ़ाता है वह अध्यापक तथा जिन्होंने पहले कभी उपकार किये हैं वे मनुष्य—ये सब-के-सब अवध्य माने गये हैं। स्त्रियोंका तथा जो सबका अतिथि-सत्कार करनेवाला हो, उस मनुष्यका भी वध नहीं करना चाहिये ।।

धरणीं गां हिरण्यं च सिद्धान्नं च तिलान् घृतम् ।
ददन्नित्यं द्विजातिभ्यो मुच्यते राजकिल्बिषात् ।।
पृथ्वी, गौ, सुवर्ण, सिद्धान्न, तिल और घी—इन वस्तुओंका ब्राह्मणके लिये प्रतिदिन दान करनेवाला राजा पापसे मुक्त हो जाता है ।।

एवं चरति यो नित्यं राजा राष्ट्रहिते रतः ।
तस्य राष्ट्रं धनं धर्मो यशः कीर्तिश्च वर्धते ।।