महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1171, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयो मार्गमनुयातीमं पदं तस्य च विद्यते ॥ ८८ ॥
यह मोक्षधर्मके ज्ञाता सत्पुरुषोंका वेदप्रतिपादित धर्म एवं सन्मार्ग है। जो इस मार्गपर चलता है, उसको ब्रह्मपदकी प्राप्ति होती है ॥ ८८ ॥
चतुर्विधा भिक्षवस्ते कुटीचकबहूदकौ ।
हंसः परमहंसश्च यो यः पश्चात् स उत्तमः ॥ ८९ ॥
संन्यासी चार प्रकारके होते हैं—कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस। इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है ॥ ८९ ॥
अतः परतरं नास्ति नावरं न तिरोग्रतः ।
अदुःखसुखं सौम्यमजरामरमव्ययम् ॥ ९० ॥
इस परमहंस धर्मके द्वारा प्राप्त होनेवाले आत्म-ज्ञानसे बढ़कर दूसरा कुछ भी नहीं है। यह परमहंस-ज्ञान किसीसे निष्कृष्ट नहीं है। परमहंस-ज्ञानके सम्मुख परमात्मा तिरोहित नहीं है। यह दुःख-सुखसे रहित सौम्य अजर-अमर और अविनाशी पद है ॥ ९० ॥
उमोवाच
गार्हस्थ्यो मोक्षधर्मश्च सज्जनाचरितस्त्वया ।
भाषितो जीवलोकस्य मार्गः श्रेयस्करो महान् ॥ ९१ ॥
उमा बोलीं— भगवन्! आपने सत्पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए गार्हस्थ्यधर्म और मोक्षधर्मका वर्णन किया। ये दोनों ही मार्ग जीवजगत्का महान् कल्याण करनेवाले हैं ॥ ९१ ॥
ऋषिधर्मं तु धर्मज्ञ श्रोतुमिच्छाम्यतः परम् ।
स्पृहा भवति मे नित्यं तपोवननिवासिषु ॥ ९२ ॥
धर्मज्ञ! अब मैं ऋषिधर्म सुनना चाहती हूँ। तपोवननिवासी मुनियोंके प्रति सदा ही मेरे मनमें स्नेह बना रहता है ॥ ९२ ॥
आज्यधूमोद्भवो गन्धो रुणद्धीव तपोवनम् ।
तं दृष्ट्वा मे मनः प्रीतं महेश्वर सदा भवेत् ॥ ९३ ॥
महेश्वर! ये ऋषिलोग जब अग्निमें घीकी आहुति देते हैं, उस समय उसके धूमसे प्रकट हुई सुगन्ध मानो सारे तपोवनमें छा जाती है। उसे देखकर मेरा चित्त सदा प्रसन्न रहता है ॥ ९३ ॥
एतन्मे संशयं देव मुनिधर्मकृतं विभो ।
सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञ देवदेव वदस्व मे ।
निखिलेन मया पृष्टं महादेव यथातथम् ॥ ९४ ॥
विभो! देव! यह मैंने मुनिधर्मके सम्बन्धमें जिज्ञासा प्रकट की है। देवदेव! आप सम्पूर्ण धर्मोंका तत्त्व जाननेवाले हैं, अतः महादेव! मैंने जो कुछ पूछा है, उसका पूर्णरूपसे यथावत्