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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1167, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1167

सर्वयज्ञप्रणीतस्य हयमेधेन यत् फलम् ।
वर्षे स द्वादशे देवि फलेनैतेन युज्यते ॥)
देवि! जो सम्पूर्ण यज्ञोंका सम्पादन कर चुका है, उसे अश्वमेधयज्ञसे जो फल मिलता है, वही फल इस गृहस्थको बारह वर्षोंतक पूर्वोक्त नियमोंका पालन करनेसे प्राप्त हो जाता है ॥

उमोवाच

उक्तस्त्वया पृथग्धर्मश्चातुर्वर्ण्यहितः शुभः ।
सर्वव्यापी तु यो धर्मो भगवंस्तद् ब्रवीहि मे ॥ ६१ ॥
**उमाने कहा—**भगवन्! आपने चारों वर्णोंके लिये हितकारी एवं शुभ धर्मका पृथक्-पृथक् वर्णन किया है। अब मुझे वह धर्म बतलाइये, जो सब वर्णोंके लिये समानरूपसे उपयोगी हो ॥ ६१ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ब्राह्मणा लोकसारेण सृष्टा धात्रा गुणार्थिना ।
लोकांस्तारयितुं कृत्स्नान् मर्त्येषु क्षितिदेवताः ॥ ६२ ॥
तेषामपि प्रवक्ष्यामि धर्मकर्मफलोदयम् ।
ब्राह्मणेषु हि यो धर्मः स धर्मः परमो मतः ॥ ६३ ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! गुणोंकी अभिलाषा रखनेवाले जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने समस्त लोकोंका उद्धार करनेके लिये जगत्की सार वस्तुद्वारा मृत्युलोकमें ब्राह्मणोंकी सृष्टि की है। ब्राह्मण इस भूमण्डलके देवता हैं, अतः पहले उनके ही धर्म-कर्म और उनके फलोंका वर्णन करता हूँ, क्योंकि ब्राह्मणोंमें जो धर्म होता है, उसे ही परम धर्म माना जाता है ॥ ६२-६३ ॥
इमे ते लोकधर्मार्थं त्रयः सृष्टाः स्वयम्भुवा ।
पृथिव्यां सर्जने नित्यं सृष्टांस्तानपि मे शृणु ॥ ६४ ॥
ब्रह्माजीने सम्पूर्ण जगत्की रक्षाके लिये तीन प्रकारके धर्मका विधान किया है। पृथ्वीकी सृष्टिके साथ ही इन तीनों धर्मोंकी सृष्टि हो गयी है, इनको भी तुम मुझसे सुनो ॥ ६४ ॥
वेदोक्तः परमो धर्मः स्मृतिशास्त्रगतोऽपरः ।
शिष्टाचीर्णोऽपरः प्रोक्तस्त्रयो धर्माः सनातनाः ॥ ६५ ॥
पहला है वेदोक्त धर्म, जो सबसे उत्कृष्ट धर्म है। दूसरा है वेदानुकूल स्मृति-शास्त्रमें वर्णित—स्मार्तधर्म और तीसरा है शिष्ट पुरुषोंद्वारा आचरित धर्म (शिष्टाचार)। ये तीनों धर्म सनातन हैं ॥ ६५ ॥
त्रैविद्यो ब्राह्मणो विद्वान् न चाध्ययनजीवकः ।
त्रिकर्मा त्रिपरिक्रान्तो मैत्र एष स्मृतो द्विजः ॥ ६६ ॥