सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1111, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1111

उसके ऊपर कभी पापका प्रभाव नहीं पड़ेगा, वह कभी पापसे लिप्त नहीं होगा। जो इस प्रसंगको पढ़ेगा, दूसरोंको सुनायेगा अथवा स्वयं सुनेगा, उसे भी उन धर्मोंके आचरणका फल मिलेगा। उसका दिया हुआ हव्य-कव्य अक्षय होगा तथा उसे देवता और पितर बड़ी प्रसन्नतासे ग्रहण करेंगे ।। ११ १/२ ।।

श्रावयंश्रापि विप्रेन्द्रान् पर्वसु प्रयतो नरः ।। १२ ।।
ऋषीणां देवतानां च पितॄणां चैव नित्यदा ।
भवत्यभिमतः श्रीमान् धर्मेषु प्रयततः सदा ।। १३ ।।
जो मनुष्य पर्वके दिन शुद्धचित्त होकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धर्मके इन रहस्योंका श्रवण करायेगा, वह सदा देवता, ऋषि और पितरोंके आदरका पात्र एवं श्रीसम्पन्न होगा। उसकी सदा धर्मोंमें प्रवृत्ति बनी रहेगी ।। १२-१३ ।।

कृत्वापि पापकं कर्म महापातकवर्जितम् ।
रहस्यधर्मं श्रुत्वेमं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। १४ ।।
मनुष्य महापातकको छोड़कर अन्य पापोंका आचरण करके भी यदि इस रहस्य-धर्मको सुन लेगा तो उन सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जायगा ।। १४ ।।

भीष्म उवाच

एतद् धर्मरहस्यं वै देवतानां नराधिप ।
व्यासोद्दिष्टं मया प्रोक्तं सर्वदेवनमस्कृतम् ।। १५ ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**नरेश्वर! देवताओंके बताये हुए इस धर्मरहस्यको व्यासजीने मुझसे कहा था। उसीको मैंने तुम्हें बताया है। यह सब देवताओंद्धारा समादृत है ।।

पृथिवी रत्नसम्पूर्णा ज्ञानं चेदमनुत्तमम् ।
इदमेव ततः श्राव्यमिति मन्येत धर्मवित् ।। १६ ।।
एक ओर रत्नोंसे भरी हुई सम्पूर्ण पृथिवी प्राप्त होती हो और दूसरी ओर यह सर्वोत्तम ज्ञान मिल रहा हो तो उस पृथिवीको छोड़कर इस सर्वोत्तम ज्ञानको ही श्रवण एवं ग्रहण करना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुष ऐसा ही माने ।।

नाश्रद्दधानाय न नास्तिकाय
न नष्टधर्माय न निर्घृणाय ।
न हेतुदुष्टाय गुरुद्विषे वा
नानात्मभूताय निवेद्यमेतत् ।। १७ ।।
न श्रद्धाहीनको, न नास्तिकको, न धर्म नष्ट करनेवालेको, न निर्दयीको, न युक्तिवादका सहारा लेकर दुष्टता करनेवालेको, न गुरुद्रोहीको और न देहाभिमानी व्यक्तिको ही इस धर्मका उपदेश देना चाहिये ।। १७ ।।