महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकीड़ा होकर भी आज राजकुमार हो गया हूँ ।। १२ ।।
वहन्ति मामतिबलाः कुञ्जरा हेममालिनः ।
स्यन्दनेषु च काम्बोजा युक्ताः परमवाजिनः ।। १३ ।।
अब सोनेकी मालाओंसे सुशोभित अत्यन्त बलवान् गजराज मेरी सवारीमें रहते हैं। उत्तम जातिके काबुली घोड़े मेरे रथोंमें जोते जाते हैं ।। १३ ।।
उष्ट्राश्वतरयुक्तानि यानानि च वहन्ति माम् ।
सबान्धवः सहामात्यश्चाश्नामि पिशितौदनम् ।। १४ ।।
ऊँटों और खच्चरोंसे जुती हुई गाड़ियाँ मुझे ढोती हैं। मैं भाई-बन्धुओं और मन्त्रियोंके साथ मांस-भात खाता हूँ ।। १४ ।।
गृहेषु स्वनिवासेषु सुखेषु शयनेषु च ।
वरार्हेषु महाभाग स्वपामि च सुपूजितः ।। १५ ।।
महाभाग! श्रेष्ठ पुरुषोंमें रहने योग्य अपने निवासभूत सुन्दर महलोंके भीतर सुखद शय्याओंपर मैं बड़े सम्मानके साथ शयन करता हूँ ।। १५ ।।
सर्वेष्वपररात्रेषु सूमागधबन्दिनः ।
स्तुवन्ति मां यथा देवा महेन्द्रं प्रियवादिनः ।। १६ ।।
प्रतिदिन रातके पिछले पहरोंमें सूत, मागध और वन्दीजन मेरी स्तुति करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे देवता प्रिय वचन बोलकर महेन्द्रके गुण गाते हैं ।। १६ ।।
प्रसादात् सत्यसंधस्य भवतोऽमिततेजसः ।
यदहं कीटतां प्राप्य सम्प्राप्तो राजपुत्रताम् ।। १७ ।।
आप सत्यप्रतिज्ञ हैं, अमित तेजस्वी हैं, आपके प्रसादसे ही आज मैं कीड़ेसे राजपूत हो गया हूँ ।। १७ ।।
नमस्तेऽस्तु महाप्राज्ञ किं करोमि प्रशाधि माम् ।
त्वत्तपोबलनिर्दिष्टमिदं ह्यधिगतं मया ।। १८ ।।
महाप्राज्ञ! आपको नमस्कार है, मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ; आपके तपोबलसे ही मुझे राजपद प्राप्त हुआ है ।। १८ ।।
व्यास उवाच
अर्चितोऽहं त्वया राजन् वाग्भिरद्य यदृच्छया ।
अद्य ते कीटतां प्राप्य स्मृतिर्जाता जुगुप्सिता ।। १९ ।।
व्यासजीने कहा— राजन्! आज तुमने अपनी वाणीसे मेरा भलीभाँति स्तवन किया है। अभीतक तुम्हें अपनी कीट-योनिकी घृणित स्मृति अर्थात् मांस खानेकी वृत्ति बनी हुई है ।। १९ ।।
न तु नाशोऽस्ति पापस्य यस्त्वयोपचितः पुरा ।