महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 93, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंइति यः कुरुते भावं स त्यागी भरतर्षभ ।
न यः परित्यज्य गृहान् वनमेति विमूढवत् ॥ १४ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो ऐसा भाव रखता है, वही त्यागी है। जो मूर्खकी तरह घर छोड़कर वनमें चला जाता है, वह त्यागी नहीं है ॥ १४ ॥
यदा कामान् समीक्षेत धर्मवैतंसिको नरः ।
अथैनं मृत्युपाशेन कण्ठे बध्नाति मृत्युराट् ॥ १५ ॥
वनमें रहकर भी यदि धर्मध्वजी मनुष्य काम-भोगोंपर दृष्टिपात (उनका स्मरण) करता है तो यमराज उसके गलेमें मौतका फंदा डाल देते हैं ॥ १५ ॥
अभिमानकृतं कर्म नैतत् फलवदुच्यते ।
त्यागयुक्तं महाराज सर्वमेव महाफलम् ॥ १६ ॥
महाराज! यही कर्म यदि अभिमानपूर्वक किया जाय तो वह सफल नहीं होता, और त्यागपूर्वक किया हुआ सारा कर्म ही महान् फलदायक होता है ॥ १६ ॥
शमो दमस्तथा धैर्यं सत्यं शौचमथार्जवम् ।
यज्ञो धृतिश्च धर्मश्च नित्यमार्षो विधिः स्मृतः ॥ १७ ॥
शम, दम, धैर्य, सत्य, शौच, सरलता, यज्ञ, धृति तथा धर्म—इन सबका ऋषियोंके लिये निरन्तर पालन करनेका विधान है ॥ १७ ॥
पितृदेवातिथिकृते समारम्भोऽत्र शस्यते ।
अत्रैव हि महाराज त्रिवर्गः केवलं फलम् ॥ १८ ॥
महाराज! गृहस्थ-आश्रममें ही देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंके लिये किये जानेवाले आयोजनकी प्रशंसा की जाती है। केवल यहीं धर्म, अर्थ और काम—ये तीनों सिद्ध होते हैं ॥ १८ ॥
एतस्मिन् वर्तमानस्य विधावप्रतिषेधिते ।
त्यागिनः प्रसृतस्येह नोच्छित्तिर्विद्यते क्वचित् ॥ १९ ॥
यहाँ रहकर वेदविहित विधिका पालन करनेवाले निष्ठावान् त्यागीका कभी विनाश नहीं होता—वह पारलौकिक उन्नतिसे कभी वञ्चित नहीं रहता ॥ १९ ॥
असृजद्धि प्रजा राजन् प्रजापतिरकल्मषः ।
मां यक्ष्यन्तीति धर्मात्मा यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ॥ २० ॥
राजन्! पापरहित धर्मात्मा प्रजापतिने इस उद्देश्यसे प्रजाओंकी सृष्टि की कि 'ये नाना प्रकारकी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा मेरा यजन करेंगी' ॥ २० ॥
वीरुधश्चैव वृक्षांश्च यज्ञार्थं वै तथौषधीः ।
पशूंश्चैव तथा मेध्यान् यज्ञार्थानि हवींषि च ॥ २१ ॥
इसी उद्देश्यसे उन्होंने यज्ञसम्पादनके लिये नाना प्रकारकी लता-वेलों, वृक्षों, ओषधियों, मेध्य पशुओं तथा यज्ञार्थक हविष्योंकी भी सृष्टि की है ॥ २१ ॥