महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 836, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाबाहो! उन महर्षिका शरीर दूसरे मनुष्योंसे आठ गुना लंबा था। राजर्षे! मैंने उनकी-
जैसी दुर्बलता कहीं भी नहीं देखी है ॥ ७ ॥
शरीरमपि राजेन्द्र तस्य कानिष्ठिकासमम् ।
ग्रीवा बाहू तथा पादौ केशाश्चाद्भुतदर्शनाः ॥ ८ ॥
‘राजेन्द्र! उनका शरीर भी कनिष्ठिका अंगुलीके समान पतला था। उनकी गर्दन, दोनों भुजाएँ, दोनों पैर और सिरके बाल भी अद्भुत दिखायी देते थे ॥ ८ ॥
शिरः कायानुरूपं च कर्णौ नेत्रे तथैव च ।
तस्य वाक्चैव चेष्टा च सामान्ये राजसत्तम ॥ ९ ॥
शरीरके अनुरूप ही उनके मस्तक, कान और नेत्र भी थे। नृपश्रेष्ठ! उनकी वाणी और चेष्टा साधारण थी ॥ ९ ॥
दृष्ट्वाहं तं कृशं विप्रं भीतः परमदुर्मनाः ।
पादौ तस्याभिवाद्याथ स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ॥ १० ॥
मैं उन दुबले-पतले ब्राह्मणको देखकर डर गया और मन-ही-मन बहुत दुखी हो गया; फिर उनके चरणोंमें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उनके आगे खड़ा हो गया ॥ १० ॥
निवेद्य नामगोत्रे च पितरं च नरर्षभ ।
प्रदिष्टे चासने तेन शनैरहमुपाविशम् ॥ ११ ॥
नरश्रेष्ठ! उनके सामने नाम, गोत्र और पिताका परिचय देकर उन्हींके दिये हुए आसन पर धीरेसे बैठ गया ॥ ११ ॥
ततः स कथयामास कथां धर्मार्थसंहिताम् ।
ऋषिमध्ये महाराज तनुर्धर्मभृतां वरः ॥ १२ ॥
महाराज! तदनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तनु ऋषियोंके बीचमें बैठकर धर्म और अर्थसे युक्त कथा कहने लगे ॥ १२ ॥
तस्मिंस्तु कथयत्येव राजा राजीवलोचनः ।
उपायाज्जवनैरश्वैः सबलः सावरोधनः ॥ १३ ॥
उनके कथा कहते समय ही कमलके समान नेत्रोंवाले एक नरेश वेगशाली घोड़ोंद्वारा अपनी सेना और अन्तःपुरके साथ वहाँ आ पहुँचे ॥ १३ ॥
स्मरन् पुत्रमरण्ये वै नष्टं परमदुर्मनाः ।
भूरिद्युम्नपिता श्रीमान् वीरद्युम्नो महायशाः ॥ १४ ॥
उनका पुत्र जंगलमें खो गया था। उसकी याद करके वे बहुत दुखी हो रहे थे। उनके पुत्रका नाम था भूरिद्युम्न और वे उसके महायशस्वी पिता श्रीमान् वीरद्युम्न थे ॥ १४ ॥
इह द्रक्ष्यामि तं पुत्रं द्रक्ष्यामीहेति पार्थिवः ।
एवमाशाहृतो राजा चरन् वनमिदं पुरा ॥ १५ ॥