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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 760, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 760

उसका मुख सूख गया और वह अधमरा-सा हो गया, इस प्रकार निन्दनीय कर्म करके वह अपनी प्रशंसा करता है और तनिक भी लजाता नहीं है ।।

उपेक्षितव्यो यत्नेन तादृशः पुरुषाधमः ।
यद् यद् ब्रूयादल्पमतिस्तत्तदस्य सहेद्बुधः ।। ७ ।।
ऐसे नराधमकी यत्नपूर्वक उपेक्षा कर देनी चाहिये। मूर्ख मनुष्य जो कुछ भी कह दे, विद्वान् पुरुषको वह सब सह लेना चाहिये ।। ७ ।।

प्राकृतो हि प्रशंसन् वा निन्दन् वा किं करिष्यति ।
वने काक इवाबुद्धिर्वाशमानो निरर्थकम् ।। ८ ।।
जैसे वनमें कौआ व्यर्थ ही काँव-काँव किया करता है, उसी तरह मूर्ख मनुष्य भी अकारण ही निन्दा करता है। वह प्रशंसा करे या निन्दा, किसीका क्या भला या बुरा करेगा? अर्थात् कुछ भी नहीं कर सकेगा ।। ८ ।।

यदि वाग्भिः प्रयोगः स्यात् प्रयोगे पापकर्मणः ।
वागेवार्थो भवेत् तस्य न ह्येवार्थो जिघांसतः ।। ९ ।।
यदि पापाचारी पुरुषके कटुवचन बोलनेपर बदलेमें वैसे ही वचनोंका प्रयोग किया जाय तो उससे केवल वाणीद्वारा कलहमात्र होगा। जो हिंसा करना चाहता है, उसका गाली देनेसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा ।। ९ ।।

निषेकं विपरीतं स आचष्टे वृत्तचेष्टया ।
मयूर इव कौपीनं नृत्यं संदर्शयन्निव ।। १० ।।
मयूर जब नाच दिखाता है, उस समय वह अपने गुप्त अंगोंको भी उघाड़ देता है। इसी प्रकार जो मूर्ख अनुचित आचरण करता है वह उस कुचेष्टाद्वारा अपने छिपे हुए दोषोंको प्रकट करता है ।। १० ।।

यस्यावाच्यं न लोकेऽस्ति नाकार्यं चापि किंचन ।
वाचं तेन न संदध्याच्छुचिः संश्लिष्टकर्मणा ।। ११ ।।
संसारमें जिसके लिये कुछ भी कह देना या कर डालना असम्भव नहीं है, ऐसे मनुष्यसे उस भले मनुष्यको बात भी नहीं करनी चाहिये जो अपने सत्कर्मके द्वारा विशुद्ध समझा जाता है ।। ११ ।।

प्रत्यक्षं गुणवादी यः परोक्षे चापि निन्दकः ।
स मानवः श्ववल्लोके नष्टलोकपरापरः ।। १२ ।।
जो सामने आकर गुण गाता है और परोक्षमें निन्दा करता है, वह मनुष्य संसारमें कुत्तेके सामन है। उसके लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं ।। १२ ।।

तादृग्जनशतस्यापि यद् ददाति जुहोति च ।
परोक्षेणापवादी यस्तं नाशयति तत्क्षणात् ।। १३ ।।