महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 747, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंदुःखेनसाद्यते पात्रं धार्यतामेष ते सुहृत् ॥ ६९ ॥
'बेटा! तुमने ही इस सियारको मन्त्रीके पदपर बिठाया है, और तुम्हारे सामन्तोंमें भी इसकी ख्याति बढ़ गयी है। कोई सुपात्र व्यक्ति बड़ी कठिनाईसे प्राप्त होता है। यह सियार तुम्हारा हितैषी सुहृद् है; इसलिये तुम इसकी रक्षा करो ॥ ६९ ॥
दूषितं परदोषैर्हि गृह्णीते योऽन्यथा शुचिम् ।
स्वयं संदूषितामात्यः क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ ७० ॥
'जो दूसरोंके मिथ्या कलंक लगानेपर किसी निर्दोषको भी दण्ड देता है, वह दुष्ट मन्त्रियोंवाला राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है' ॥ ७० ॥
तस्मादप्यरिसंघाताद् गोमायोः कश्चिदागतः ।
धर्मात्मा तेन चाख्यातं यथैतत् कपटं कृतम् ॥ ७१ ॥
तदनन्तर उन्हीं शत्रुओंके समूहमेंसे किसी धर्मात्मा सियारने (जो शेरका गुप्तचर बना था,) आकर गीदड़के साथ जो यह छल-कपट किया गया था, वह सब सिंहको कह सुनाया ॥ ७१ ॥
ततो विज्ञातचरितः सत्कृत्य स विमोक्षितः ।
परिष्वक्तश्च सस्नेहं मृगेन्द्रेण पुनः पुनः ॥ ७२ ॥
इससे शेरको सियारकी सच्चरित्रताका पता चल गया और उसने उसका सत्कार करके उसे इस अभियोगसे मुक्त कर दिया। इतना ही नहीं, मृगराजने स्नेहपूर्वक बारंबार अपने सचिवको गलेसे लगाया ॥ ७२ ॥
अनुज्ञाप्य मृगेन्द्रं तु गोमायुर्नीतिशास्त्रवित् ।
तेनामर्षेण संतप्तः प्रायमासितुमैच्छत ॥ ७३ ॥
तत्पश्चात् नीतिशास्त्रके ज्ञाता सियारने मृगराजकी आज्ञा लेकर अमर्षसे संतप्त हो उपवास करके प्राण त्याग देनेका विचार किया ॥ ७३ ॥
शार्दूलस्तं तु गोमायुं स्नेहात् प्रोत्फुल्ललोचनः ।
अवारयत् स धर्मिष्ठं पूजया प्रतिपूजयन् ॥ ७४ ॥
शेरने धर्मात्मा गीदड़का भलीभाँति आदर-सत्कार करके उसे उपवाससे रोक दिया। उस समय उसके नेत्र स्नेहसे खिल उठे थे ॥ ७४ ॥
तं स गोमायुरालोक्य स्नेहादागतसम्भ्रमम् ।
उवाच प्रणतो वाक्यं बाष्पगद्गदया गिरा ॥ ७५ ॥
सियारने देखा, मालिकका हृदय स्नेहसे आकुल हो रहा है, तब उसने उसे प्रणाम करके अश्रुगद्गद वाणीसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥ ७५ ॥
पूजितोऽहं त्वया पूर्वं पश्चाच्चैव विमानितः ।
परेषामास्पदं नीतो वस्तुं नार्हाम्यहं त्वयि ॥ ७६ ॥