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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 735, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 735

जो मानव जन्मसे ही सदाके लिये मधु, मांस और मदिराका त्याग कर देते हैं, वे भी दुस्तर दुःखोंसे छूट जाते हैं ॥ २२ ॥
यात्रार्थं भोजनं येषां संतानार्थं च मैथुनम् ।
वाक् सत्यवचनार्थाय दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २३ ॥
जिनका भोजन स्वादके लिये नहीं, जीवनयात्राका निर्वाह करनेके लिये होता है, जो विषयवासनाकी तृप्तिके लिये नहीं, संतानकी इच्छासे मैथुनमें प्रवृत्त होते हैं तथा जिनकी वाणी केवल सत्य बोलनेके लिये है, वे समस्त संकटोंसे पार हो जाते हैं ॥ २३ ॥
ईश्वरं सर्वभूतानां जगतः प्रभवाप्ययम् ।
भक्ता नारायणं देवं दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २४ ॥
जो समस्त प्राणियोंके स्वामी तथा जगत्की उत्पत्ति और प्रलयके हेतुभूत भगवान् नारायणमें भक्तिभाव रखते हैं, वे दुस्तर दुःखोंसे तर जाते हैं ॥ २४ ॥
य एष पद्मरक्ताक्षः पीतवासा महाभुजः ।
सुहृद् भ्राता च मित्रं च सम्बन्धी च तथाच्युतः ॥ २५ ॥
युधिष्ठिर! ये जो कमल पुष्पके समान कुछ-कुछ लाल रंगके नेत्रोंसे सुशोभित पीताम्बरधारी महाबाहु श्रीकृष्ण हैं, जो तुम्हारे सुहृद् भाई, मित्र और सम्बन्धी भी हैं, यही साक्षात् नारायण हैं ॥ २५ ॥
य इमान् सकलाँल्लोकाँश्चर्मवत् परिवेष्टयेत् ।
इच्छन् प्रभुरचिन्त्यात्मा गोविन्दः पुरुषोत्तमः ॥ २६ ॥
इनका स्वरूप अचिन्त्य है। ये पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द इन सम्पूर्ण लोकोंको इच्छापूर्वक चमड़ेकी भाँति आच्छादित किये हुए हैं ॥ २६ ॥
स्थितः प्रियहिते जिष्णोः स एष पुरुषोत्तमः ।
राजंस्तव च दुर्धर्षो वैकुण्ठः पुरुषर्षभ ॥ २७ ॥
पुरुषप्रवर युधिष्ठिर! वे ही ये दुर्धर्ष वीर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण साक्षात् वैकुण्ठधामके निवासी श्रीविष्णु हैं। राजन्! ये इस समय तुम्हारे और अर्जुनके प्रिय तथा हितसाधनमें संलग्न हैं ॥ २७ ॥
य एनं संश्रयन्तीह भक्ता नारायणं हरिम् ।
ते तरन्तीह दुर्गाणि न चात्रास्ति विचारणा ॥ २८ ॥
जो भक्त पुरुष यहाँ इन भगवान् श्रीहरि—नारायण देवकी शरण लेते हैं, वे दुस्तर संकटोंसे तर जाते हैं। इस विषयमें कोई संशय नहीं है ॥ २८ ॥
(अस्मिन्नर्पितकर्माणः सर्वभावेन भारत ।
कृष्णे कमलपत्राक्षे दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥
भारत! जो इन कमलनयन श्रीकृष्णको सम्पूर्ण भक्तिभावसे अपने सारे कर्म समर्पित कर देते हैं, वे दुर्गम संकटोंको लाँघ जाते हैं ।।