महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 700, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरंतु तुम तो समझदार हो, तुम्हें मालूम है, भोग प्रारब्धके अधीन और अस्थिर हैं, तो भी नहीं चाहनेयोग्य विषयोंको चाहते हो और उनके लिये दीनता दिखाते हुए शोक कर रहे हो ॥ ३६ ॥
तां बुद्धिमुपजिज्ञासुस्त्वमेवैतान् परित्यज ।
अनर्थांश्चार्थरूपेण ह्यर्थांश्चानर्थरूपिणः ॥ ३७ ॥
तुम पूर्वोक्त बुद्धिको समझनेकी चेष्टा करो और इन भोगोंको छोड़ो, जो तुम्हें अर्थके रूपमें प्रतीत होनेवाले अनर्थ हैं; क्योंकि वास्तवमें समस्त भोग अनर्थस्वरूप ही हैं ॥ ३७ ॥
अर्थायैव हि केषांचिद् धननाशो भवत्युत ।
आनन्त्यं तत्सुखं मत्वा श्रियमन्यः परीप्सति ॥ ३८ ॥
इस अर्थ या भोगके लिये ही कितने ही लोगोंके धनका नाश हो जाता है। दूसरे लोग सम्पत्तिको अक्षय सुख मानकर उसे पानेकी इच्छा करते हैं ॥ ३८ ॥
रममाणः श्रिया कश्चिन्नान्यच्छ्रेयोऽभिमन्यते ।
तथा तस्येहमानस्य समारम्भो विनश्यति ॥ ३९ ॥
कोई-कोई मनुष्य तो धन-सम्पत्तिमें इस तरह रम जाता है कि उसे उससे बढ़कर सुखका साधन और कुछ जान ही नहीं पड़ता है। अतः वह धनोपार्जनकी ही चेष्टामें लगा रहता है। परंतु दैववश उस मनुष्यका वह सारा उद्योग सहसा नष्ट हो जाता है ॥ ३९ ॥
कृच्छ्राल्लब्धमभिप्रेतं यदि कौसल्य नश्यति ।
तदा निर्विद्यते सोऽर्थात् परिभग्नक्रमो नरः ॥ ४० ॥
(अनित्यां तां श्रियं मत्वा श्रियं वा कः परीप्सति ।)
कोसलनरेश! बड़े कष्टसे प्राप्त किया हुआ वह अभीष्ट धन यदि नष्ट हो जाता है तो उसके उद्योगका सिलसिला टूट जाता है और वह धनसे विरक्त हो जाता है। इस प्रकार उस सम्पत्तिको अनित्य समझकर भी भला कौन उसे प्राप्त करनेकी इच्छा करेगा? ॥ ४० ॥
धर्ममेकेऽभिपद्यन्ते कल्याणाभिजना नराः ।
परत्र सुखमिच्छन्तो निर्विद्येयुश्च लौकिकात् ॥ ४१ ॥
उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए कुछ ही मनुष्य ऐसे हैं, जो धर्मकी शरण लेते हैं और परलोकमें सुखकी इच्छा रखकर समस्त लौकिक व्यापारसे उपरत हो जाते हैं ॥ ४१ ॥
जीवितं संत्यजन्त्येके धनलोभपरा जनाः ।
न जीवितार्थं मन्यन्ते पुरुषा हि धनादृते ॥ ४२ ॥
कुछ लोग तो ऐसे हैं, जो धनके लोभमें पड़कर अपने प्राणतक गँवा देते हैं। ऐसे मनुष्य धनके सिवा जीवनका दूसरा कोई प्रयोजन ही नहीं समझते ॥ ४२ ॥
पश्य तेषां कृपणतां पश्य तेषामबुद्धिताम् ।
अध्रुवे जीविते मोहादर्थदृष्टिमुपाश्रिताः ॥ ४३ ॥