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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 695, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 695

क्षुद्रादन्यत्र चाचारात् तन्ममाचक्ष्व सत्तम ॥ ५ ॥
साधुशिरोमणे! आत्मघात करने, दीनता दिखाने, दूसरोंकी शरणमें जाने तथा इसी तरहके और भी नीच कर्म करनेकी बात छोड़कर दूसरा कोई उपाय हो तो वह मुझे बताइये ॥ ५ ॥

व्याधिना चाभिपन्नस्य मानसेनेतरेण वा ।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च त्वद्विधः शरणं भवेत् ॥ ६ ॥
जो मानसिक अथवा शारीरिक रोगसे पीड़ित है, ऐसे मनुष्यको आप-जैसे धर्मज्ञ और कृतज्ञ महात्मा ही शरण देनेवाले होते हैं ॥ ६ ॥

निर्विद्यति नरः कामान्निर्विद्य सुखमेधते ।
त्यक्त्वा प्रीतिं च शोकं च लब्ध्वा बुद्धिमयं वसु ॥ ७ ॥
मनुष्यको जब कभी विषय-भोगोंसे वैराग्य होता है, तब विरक्त होनेपर वह हर्ष और शोकको त्याग देता है तथा ज्ञानमय धन पाकर नित्य सुखका अनुभव करने लगता है ॥ ७ ॥

सुखमर्थाश्रयं येषामनुशोचामि तानहम् ।
मम ह्यर्थाः सुबहवो नष्टाः स्वप्न इवागताः ॥ ८ ॥
जिनके सुखका आधार धन है, अर्थात् जो धनसे ही सुख मानते हैं, उन मनुष्योंके लिये मैं निरन्तर शोक करता हूँ; क्योंकि मेरे पास धन बहुत था, परंतु वह सब सपनेमें मिली हुई सम्पत्तिकी तरह नष्ट हो गया ॥ ८ ॥

दुष्करं बत कुर्वन्ति महतोऽर्थांस्त्यजन्ति ये ।
वयं त्वेतान् परित्यक्तुमसतोऽपि न शक्नुमः ॥ ९ ॥
मेरी समझमें जो अपनी विशाल सम्पत्तिको त्याग देते हैं वे अत्यन्त दुष्कर कार्य करते हैं। मेरे पास तो अब धनके नामपर कुछ नहीं है, तो भी मैं उसका मोह नहीं छोड़ पाता हूँ ॥ ९ ॥

इमामवस्थां सम्प्राप्तं दीनमार्तं श्रिया च्युतम् ।
यदन्यत् सुखमस्तीह तद् ब्रह्मन्ननुशाधि माम् ॥ १० ॥
ब्रह्मन्! मैं राज्यलक्ष्मीसे भ्रष्ट, दीन और आर्त होकर इस शोचनीय अवस्थामें आ पड़ा हूँ। इस जगत्में धनके अतिरिक्त जो सुख हो, उसीका मुझे उपदेश कीजिये ॥ १० ॥

कौसल्येनैवमुक्तस्तु राजपुत्रेण धीमता ।
मुनिः कालकवृक्षीयः प्रत्युवाच महाद्युतिः ॥ ११ ॥
बुद्धिमान् कोसलराजकुमारके इस प्रकार पूछनेपर महातेजस्वी कालकवृक्षीय मुनिने इस तरह उत्तर दिया ॥ ११ ॥

मुनिरुवाच

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