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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 670, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 670

लोग सो रहे हों, प्यासे हों, थक गये हों अथवा इधर-उधर भाग रहे हों, उनपर अघात न करे ।। २६ ।।

मोक्षे प्रयाणे चलने पानभोजनकालयोः ।
अतिक्षिप्तान् व्यतिक्षिप्तान् निहतान् प्रतनूकृतान् ।। २७ ।।
सुविश्रब्धान् कृतारम्भानुपन्यासान् प्रतापितान् ।
बहिश्चरानुपन्यासान् कृतवेश्मानुसारिणः ।। २८ ।।

शस्त्र और कवच उतार देनेके बाद, युद्धस्थलसे प्रस्थान करते समय, घूमते-फिरते समय और खाने-पीनेके अवसरपर किसीको न मारे। इसी प्रकार जो बहुत घबराये हुए हों, पागल हो गये हों, घायल हों, दुर्बल हो गये हों, निश्चिन्त होकर बैठे हों, दूसरे किसी काममें लगे हों, लेखनका कार्य करते हों, पीड़ासे संतप्त हों, बाहर घूम रहे हों, दूरसे सामान लाकर लोगोंके निकट पहुँचानेका काम करते हों अथवा छावनीकी ओर भागे जा रहे हों, उनपर भी प्रहार न करे ।। २७-२८ ।।

पारम्पर्यागते द्वारे ये केचिदनुवर्तिनः ।
परिचर्यावतो द्वारे ये च केचन वर्गिणः ।। २९ ।।

जो परम्परासे प्राप्त हुए राजद्वारपर रक्षा आदि सेवाका कार्य करते हों अथवा जो राजसेवक मन्त्री आदिके द्वारपर पहरा देते हों तथा किसी यूथके अधिपति हों, उनको भी नहीं मारना चाहिये ।। २९ ।।

अनीकं ये विभिन्दन्ति भिन्नं संस्थापयन्ति च ।
समानाशनपानास्ते कार्याः द्विगुणवेतनाः ।। ३० ।।

जो शत्रु की सेनाको छिन्न-भिन्न कर डालते हैं और अपनी तितर-बितर हुई सेनाको संगठित करके दृढ़तापूर्वक स्थापित करनेकी शक्ति रखते हैं, ऐसे लोगोंको राजा अपने समान ही भोजन-पानकी सुविधा देकर सम्मानित करे और उन्हें दुगुना वेतन दे ।। ३० ।।

दशाधिपतयः कार्याः शताधिपतयस्तथा ।
ततः सहस्राधिपतिं कुर्याच्छूरमतन्द्रितम् ।। ३१ ।।

सेनामें कुछ लोगोंको दस-दस सैनिकोंका नायक बनावे, कुछको सौका तथा किसी प्रमुख और आलस्यरहित वीरको एक हजार योद्धाओंका अध्यक्ष नियुक्त करे ।। ३१ ।।

यथामुख्यान् संनिपात्य वक्तव्याः संशपामहे ।
विजयार्थं हि संग्रामे न त्यक्ष्यामः परस्परम् ।। ३२ ।।

तत्पश्चात् मुख्य-मुख्य वीरोंको एकत्र करके यह प्रतिज्ञा करावे कि हम संग्राममें विजय प्राप्त करनेके लिये प्राण रहते एक-दूसरेका साथ नहीं छोड़ेंगे ।। ३२ ।।

इहैव ते निवर्तन्तां ये च केचन भीरवः ।
ये घातयेयुः प्रवरं कुर्वाणास्तुमुलं प्रति ।। ३३ ।।