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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 616, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 616

चातुर्वर्ण्यं तथा वेदाश्चातुराश्रम्यमेव च ।
सर्वं प्रमुह्यते ह्येतद् यदा राजा प्रमाद्यति ॥ ७ ॥
जब राजा प्रमाद करता है, तब चारों वर्ण, चारों वेद और चारों आश्रम सभी मोहमें पड़ जाते हैं ॥ ७ ॥

अग्नित्रेता त्रयी विद्या यज्ञाश्च सहदक्षिणाः ।
सर्व एव प्रमाद्यन्ति यदा राजा प्रमाद्यति ॥ ८ ॥
जब राजा प्रमादी हो जाता है, तब गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि—ये तीन अग्नि; ऋक्, साम और यजु—ये तीन वेद एवं दक्षिणाओंके साथ सम्पूर्ण यज्ञ भी विकृत हो जाते हैं ॥ ८ ॥

राजैव कर्ता भूतानां राजैव च विनाशकः ।
धर्मात्मा यः स कर्तास्यादधर्मात्मा विनाशकः ॥ ९ ॥
राजा ही प्राणियोंका कर्ता (जीवनदाता) और राजा ही उनका विनाश करनेवाला है। जो धर्मात्मा है, वह प्रजाका जीवनदाता है और जो पापात्मा है, वह उसका विनाश करनेवाला है ॥ ९ ॥

राज्ञो भार्याश्च पुत्राश्च बान्धवाः सुहृदस्तथा ।
समेत्य सर्वे शोचन्ति यदा राजा प्रमाद्यति ॥ १० ॥
जब राजा प्रमाद करने लगता है, तब उसकी स्त्री, पुत्र, बान्धव तथा सुहृद् सब मिलकर शोक करते हैं ॥

हस्तिनोऽश्वाश्च गावश्चाप्युष्ट्राश्वतरगर्दभाः ।
अधर्मभूते नृपतौ सर्वे सीदन्ति जन्तवः ॥ ११ ॥
राजाके पापपरायण हो जानेपर उसके हाथी, घोड़े, गौ, ऊँट, खच्चर और गदहे आदि सभी पशु दुःख पाते हैं ॥ ११ ॥

दुर्बलार्थं बलं सृष्टं धात्रा मान्धातुरुच्यते ।
अबलं तु महद्भूतं यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ १२ ॥
मान्धाता! कहते हैं कि विधाताने दुर्बल प्राणियोंकी रक्षाके लिये ही बलसम्पन्न राजाकी सृष्टि की है। निर्बल प्राणियोंका महान् समुदाय राजाके बलपर टिका हुआ है ॥ १२ ॥

यच्च भूतं सम्भजते ये च भूतास्तदन्वयाः ।
अधर्मस्थे हि नृपतौ सर्वे शोचन्ति पार्थिव ॥ १३ ॥
भूपाल! राजा जिन प्राणियोंको अन्न आदि देकर उनकी सेवा करता है और जो प्राणी राजासे सम्बन्ध रखते हैं, वे सब-के-सब उस राजाके अधर्मपरायण होनेपर शोक प्रकट करने लगते हैं ॥ १३ ॥

दुर्बलस्य च यच्चक्षुर्मुनेराशीविषस्य च ।
अविषह्यतमं मन्ये मा स्म दुर्बलमासदः ॥ १४ ॥