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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 600, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 600

अनुपायेन दमयन् प्रकोपयति वाजिनः ।। १३ ।।
राजन्! मैं ये उत्तम उपाय बतला रहा हूँ। मुझे छल-कपट या कूटनीतिकी बात बताना यहाँ अभीष्ट नहीं है। जो लोग उचित उपायका आश्रय न लेकर मनमाने तौरपर घोड़ोंका दमन करना चाहते हैं, वे उन्हें कुपित कर देते हैं (इसी तरह जो अयोग्य उपायसे प्रजाको दबाते हैं, वे उनके मनमें रोष उत्पन्न कर देते हैं) ।। १३ ।।
पानागारनिवेशाश्च वेश्याः प्रापणिकास्तथा ।
कुशीलवाः सकितवा ये चान्ये केचिदीदृशाः ।। १४ ।।
नियम्याः सर्व एवैते ये राष्ट्रस्योपघातकाः ।
एते राष्ट्रेऽभितिष्ठन्तो बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः ।। १५ ।।
शराबखाना खोलनेवाले, वेश्याएँ, कुट्टनियाँ, वेश्याओंके दलाल, जुआरी तथा ऐसे ही बुरे पेशे करनेवाले और भी जितने लोग हों, वे समूचे राष्ट्रको हानि पहुँचानेवाले हैं; अतः इन सबको दण्ड देकर दबाये रखना चाहिये। यदि ये राज्यमें टिके रहते हैं तो कल्याणमार्गपर चलनेवाली प्रजाको बड़ी बाधाएँ पहुँचाते हैं ।। १४-१५ ।।
न केनचिद् याचितव्यः कश्चित्किञ्चिदनापदि ।
इति व्यवस्था भूतानां पुरस्तान्मनुना कृता ।। १६ ।।
मनुजीने बहुत पहलेसे समस्त प्राणियोंके लिये यह नियम बना दिया है कि आपत्तिकालको छोड़कर अन्य समयमें कोई किसीसे कुछ न माँगे ।। १६ ।।
सर्वे तथानुजीवेयुर्न कुर्युः कर्म चेदिह ।
सर्व एव इमे लोका न भवेयुरसंशयम् ।। १७ ।।
यदि ऐसी व्यवस्था न होती तो सब लोग भीख माँगकर ही गुजारा करते, कोई भी यहाँ कर्म नहीं करता। ऐसी दशामें ये सम्पूर्ण जगत्के लोग निःसंदेह नष्ट हो जाते ।। १७ ।।
प्रभुर्नियमने राजा य एतान् न नियच्छति ।
भुङ्क्ते स तस्य पापस्य चतुर्भागमिति श्रुतिः ।। १८ ।।
जो राजा इन सबको नियमके अंदर रखनेमें समर्थ होकर भी इन्हें काबूमें नहीं रखता, वह इनके किये हुए पापका चौथाई भाग स्वयं भोगता है, ऐसा श्रुतिका कथन है ।। १८ ।।
भोक्ता तस्य तु पापस्य सुकृतस्य यथा तथा ।
नियन्तव्याः सदा राज्ञा पापा ये स्युर्नराधिप ।। १९ ।।
नरेश्वर! राजा जैसे प्रजाके पापका चतुर्थांश भोगता है उसी प्रकार पुण्यका भी चतुर्थांश उसे प्राप्त होता है; अतः राजाको चाहिये कि वह सदा पापियोंको दण्ड देकर उन्हें दबाये रखे ।। १९ ।।
कृतपापस्त्वसौ राजा य एतान् न नियच्छति ।
तथा कृतस्य धर्मस्य चतुर्भागमुपाश्नुते ।। २० ।।