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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 494

युधिष्ठिर! तुम मालीके समान बनो। कोयला बनानेवालेके समान न बनो (माली वृक्षकी जड़को सींचता और उसकी रक्षा करता है, तब उससे फल और फूल ग्रहण करता है, परंतु कोयला बनानेवाला वृक्षको समूल नष्ट कर देता है; उसी प्रकार तुम भी माली बनकर राज्यरूपी उद्यानको सींचकर सुरक्षित रखो और फल-फूलकी तरह प्रजासे न्यायोचित कर लेते रहो, कोयला बनानेवालेकी तरह सारे राज्यको जलाकर भस्म न करो), ऐसा करके प्रजापालनमें तत्पर रहकर तुम दीर्घकालतक राज्यका उपभोग कर सकोगे ।। २० ।।
परचक्राभियानेन यदि ते स्याद् धनक्षयः ।
अथ साम्नैव लिप्सेथा धनमब्राह्मणेषु यत् ।। २१ ।।
यदि शत्रुओंके आक्रमणसे तुम्हारे धनका नाश हो जाय तो भी सान्त्वनापूर्ण मधुर वाणीद्वारा ही ब्राह्मणेतर प्रजासे धन लेनेकी इच्छा रखो ।। २१ ।।
मा स्म ते ब्राह्मणं दृष्ट्वा धनस्थं प्रचलन्मनः ।
अन्त्यायामप्यवस्थायां किमु स्फीतस्य भारत ।। २२ ।।
भरतनन्दन! धनसम्पन्न अवस्थाकी तो बात ही क्या है? तुम अत्यन्त निर्धन अवस्थामें पड़ जाओ तो भी ब्राह्मणको धनी देखकर उसका धन लेनेके लिये तुम्हारा मन चञ्चल नहीं होना चाहिये ।। २२ ।।
धनानि तेभ्यो दद्यास्त्वं यथाशक्ति यथार्हतः ।
सान्त्वयन् परिरक्षंश्च स्वर्गमाप्स्यसि दुर्जयम् ।। २३ ।।
राजन्! तुम ब्राह्मणोंको सान्त्वना देते और उनकी रक्षा करते हुए उन्हें यथाशक्ति यथायोग्य धन देते रहना, इससे तुम्हें दुर्जय स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी ।। २३ ।।
एवं धर्मेण वृत्तेन प्रजास्त्वं परिपालय ।
स्वन्तं पुण्यं यशो नित्यं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन ।। २४ ।।
कुरुनन्दन! इस प्रकार तुम धर्मानुकूल बर्ताव करते हुए प्रजाजनोंका पालन करो। इससे परिणाममें सुखद पुण्य तथा चिरस्थायी यश प्राप्त कर लोगे ।। २४ ।।
धर्मेण व्यवहारेण प्रजाः पालय पाण्डव ।
युधिष्ठिर यथा युक्तो नाधिबन्धेन योक्ष्यसे ।। २५ ।।
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! तुम धर्मानुकूल बर्ताव करते हुए प्रजाका पालन करते रहो, जिससे युक्त रहकर तुम्हें कभी भी चिन्ता या पश्चात्ताप न हो ।। २५ ।।
एष एव परो धर्मो यद् राजा रक्षति प्रजाः ।
भूतानां हि यथा धर्मो रक्षणं परमा दया ।। २६ ।।
राजा जो प्रजाकी रक्षा करता है, यही उसका सबसे बड़ा धर्म है। समस्त प्राणियोंकी रक्षा तथा उनके प्रति परम दया ही महान् धर्म है ।। २६ ।।
तस्मादेवं परं धर्मं मन्यन्ते धर्मकोविदाः ।
यो राजा रक्षणे युक्तो भूतेषु कुरुते दयाम् ।। २७ ।।