महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 485, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकलियुगमें अधर्म तो अधिक होता है; परंतु धर्मका पालन कहीं नहीं देखा जाता। सभी वर्णोंका मन अपने धर्मसे च्युत हो जाता है ॥ ९२ ॥
शूद्रा भैक्षेण जीवन्ति ब्राह्मणाः परिचर्यया ।
योगक्षेमस्य नाशश्च वर्तते वर्णसंकरः ॥ ९३ ॥
शूद्र भिक्षा माँगकर जीवन निर्वाह करते हैं और ब्राह्मण सेवा वृत्तिसे। प्रजाके योगक्षेमका नाश हो जाता है और सब ओर वर्णसंकरता फैल जाती है ॥ ९३ ॥
वैदिकानि च कर्माणि भवन्ति विगुणान्युत ।
ऋतवो न सुखाः सर्वे भवन्त्यामयिनस्तथा ॥ ९४ ॥
वैदिक कर्म विधिपूर्वक सम्पन्न न होनेके कारण गुणहीन हो जाते हैं। प्रायः सभी ऋतुएँ सुखरहित तथा रोग प्रदान करनेवाली हो जाती हैं ॥ ९४ ॥
ह्रसन्ति च मनुष्याणां स्वरवर्णमनांस्युत ।
व्याधयश्च भवन्त्यत्र म्रियन्ते च गतायुषः ॥ ९५ ॥
मनुष्योंके स्वर, वर्ण और मन मलिन हो जाते हैं। सबको रोग-व्याधि सताने लगती है और लोग अल्पायु होकर छोटी अवस्थामें ही मरने लगते हैं ॥ ९५ ॥
विधवाश्च भवन्त्यत्र नृशंसा जायते प्रजा ।
क्वचिद् वर्षति पर्जन्यः क्वचित् सस्यं प्ररोहति ॥ ९६ ॥
इस युगमें स्त्रियाँ प्रायः विधवा होती हैं, प्रजा क्रूर हो जाती है, बादल कहीं-कहीं पानी बरसाते हैं और कहीं-कहीं ही धान उत्पन्न होता है ॥ ९६ ॥
रसाः सर्वे क्षयं यान्ति यदा नेच्छति भूमिपः ।
प्रजाः संरक्षितुं सम्यग् दण्डनीतिसमाहितः ॥ ९७ ॥
जब राजा दण्डनीतिमें प्रतिष्ठित होकर प्रजाकी भली-भाँति रक्षा करना नहीं चाहता है, उस समय इस पृथ्वीके सारे रस ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ९७ ॥
राजा कृतयुगस्रष्टा त्रेताया द्वापरस्य च ।
युगस्य च चतुर्थस्य राजा भवति कारणम् ॥ ९८ ॥
राजा ही सत्ययुगकी सृष्टि करनेवाला होता है, और राजा ही त्रेता, द्वापर तथा चौथे युग कलिकी भी सृष्टिका कारण है ॥ ९८ ॥
कृतस्य करणाद् राजा स्वर्गमत्यन्तमश्नुते ।
त्रेतायाः करणाद् राजा स्वर्गं नात्यन्तमश्नुते ॥ ९९ ॥
सत्ययुगकी सृष्टि करनेसे राजाको अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति होती है। त्रेताकी सृष्टि करनेसे राजाको स्वर्ग तो मिलता है; परंतु वह अक्षय नहीं होता ॥ ९९ ॥
प्रवर्तनाद् द्वापरस्य यथाभागमुपाश्नुते ।
कलेः प्रवर्तनाद् राजा पापमत्यन्तमश्नुते ॥ १०० ॥