सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 478

निहरेच्च तृणं मासि चैत्रे वह्निभयात् तथा ॥ ४७ ॥
घास-फूँससे छाये हुए घरोंको गीली मिट्टीसे लिपवा दे और चैत्रका महीना आते ही आग लगनेके भयसे नगरके भीतरसे घास-फूँस हटवा दे। खेतोंसे भी तृण आदिको हटा दे ॥ ४७ ॥

नक्तमेव च भक्तानि पाचयेत नराधिपः ।
न दिवा ज्वालयेदग्निं वर्जयित्वाऽऽग्निहोत्रिकम् ॥ ४८ ॥
राजाको चाहिये कि वह युद्धके अवसरोंपर नगरके लोगोंको रातमें ही भोजन बनानेकी आज्ञा दे। दिनमें अग्निहोत्रको छोड़कर और किसी कामके लिये कोई आग न जलावे ॥ ४८ ॥

कर्मारारिष्टशालासु ज्वलेदग्निः सुरक्षितः ।
गृहाणि च प्रवेश्यान्तर्विधेयः स्याद् हुताशनः ॥ ४९ ॥
लोहार आदिकी भट्टियोंमें और सूतिकागृहोंमें भी अत्यन्त सुरक्षित रूपसे आग जलानी चाहिये, आगको घरके भीतर ले जाकर ढककर रखना चाहिये ॥ ४९ ॥

महादण्डश्च तस्य स्याद् यस्याग्निर्वै दिवा भवेत् ।
प्रघोषयेत्तथैवं च रक्षणार्थं पुरस्य च ॥ ५० ॥
नगरकी रक्षाके लिये यह घोषणा करा दे कि 'जिसके यहाँ दिनमें आग जलायी जाती होगी उसे बड़ा भारी दण्ड दिया जायगा' ॥ ५० ॥

भिक्षुकांश्चाक्रिकांश्चैव क्लीबोन्मत्तान् कुशीलवान् ।
बाह्यान् कुर्यान्नरश्रेष्ठ दोषाय स्युर्हि तेऽन्यथा ॥ ५१ ॥
नरश्रेष्ठ! जब युद्ध छिड़ा हो, तब राजाको चाहिये कि वह नगरसे भिखमंगों, गाड़ीवानों, हीजड़ों, पागलों और नाटक करनेवालोंको बाहर निकाल दे; अन्यथा वे बड़ी भारी विपत्ति ला सकते हैं ॥ ५१ ॥

चत्वरेष्वथ तीर्थेषु सभास्वावसथेषु च ।
यथार्थवर्णं प्रणिधिं कुर्यात् सर्वस्य पार्थिवः ॥ ५२ ॥
राजाको चाहिये कि वह चौराहोंपर, तीर्थोंमें, सभाओंमें और धर्मशालाओंमें सबकी मनोवृत्तिको जाननेके लिये किसी शुद्ध वर्णवाले पुरुषको (जो वर्णसंकर न हो) गुप्तचर नियुक्त करे ॥ ५२ ॥

विशालान् राजमार्गांश्च कारयीत नराधिपः ।
प्रपाश्च विपणांश्चैव यथोद्देशं समाविशेत् ॥ ५३ ॥
प्रत्येक नरेशको बड़ी-बड़ी सड़कें बनवानी चाहिये और जहाँ जैसी आवश्यकता हो उसके अनुसार जलक्षेत्र और बाजारोंकी व्यवस्था करनी चाहिये ॥ ५३ ॥

भाण्डागारायुधागारान् योधागारांश्च सर्वशः ।
अश्वागारान् गजागारान् बलाधिकरणानि च ॥ ५४ ॥