महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनरेश्वर! उपर्युक्त दुर्गुणोंसे युक्त ब्राह्मण वेदोंका स्वाध्याय करता हो या न करता हो, शूद्रोंके ही समान है। उसे दासकी भाँति पंक्तिसे बाहर भोजन कराना चाहिये। ये राज-सेवक आदि सभी अधम ब्राह्मण शूद्रोंके ही तुल्य हैं। राजन्! देवकार्यमें इनका परित्याग कर देना चाहिये ।। ५ ।।
निर्मर्यादे चाशुचौ क्रूरवृत्तौ
हिंसात्मके त्यक्तधर्मस्ववृत्ते ।
हव्यं कव्यं यानि चान्यानि राजन्
देयान्यदेयानि भवन्ति चास्मै ।। ६ ।।
राजन्! जो ब्राह्मण मर्यादाशून्य, अपवित्र, क्रूर स्वभाववाला, हिंसापरायण तथा अपने धर्म और सदाचारका परित्याग करनेवाला है, उसे हव्य-कव्य तथा दूसरे दान देना न देनेके ही बराबर है ।। ६ ।।
तस्माद् धर्मो विहितो ब्राह्मणस्य
दमः शौचमार्जवं चापि राजन् ।
तथा विप्रस्याश्रमाः सर्व एव
पुरा राजन् ब्राह्मणा वै निसृष्टाः ।। ७ ।।
अतः नरेश्वर! ब्राह्मणके लिये इन्द्रियसंयम, बाहर-भीतरकी शुद्धि और सरलताके साथ-साथ धर्माचरणका ही विधान है। राजन्! सभी आश्रम ब्राह्मणोंके लिये ही हैं क्योंकि सबसे पहले ब्राह्मणोंकी ही सृष्टि हुई है ।। ७ ।।
यः स्याद् दान्तः सोमपश्चार्यशीलः
सानुक्रोशः सर्वसहो निराशीः ।
ऋजुर्मृदुरनृशंसः क्षमावान्
स वै विप्रो नेतरः पापकर्मा ।। ८ ।।
जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाला, सोमयाग करके सोमरस पीनेवाला, सदाचारी, दयालु, सब कुछ सहन करनेवाला, निष्काम, सरल, मृदु, क्रूरतारहित और क्षमाशील हो, वही ब्राह्मण कहलाने योग्य है। उससे भिन्न जो पापाचारी है, उसे ब्राह्मण नहीं समझना चाहिये ।। ८ ।।
शूद्रं वैश्यं राजपुत्रं च राजन्-
लोकाः सर्वे संश्रिता धर्मकामाः ।
तस्माद् वर्णान् शान्तिधर्मेष्वसक्तान्
मत्वा विष्णुर्नेच्छति पाण्डुपुत्र ।। ९ ।।
राजन्! पाण्डुनन्दन! धर्मपालनकी इच्छा रखनेवाले सभी लोग, सहायताके लिये शूद्र, वैश्य तथा क्षत्रियकी शरण लेते हैं। अतः जो वर्ण शान्तिधर्म (मोक्ष-साधन)में असमर्थ माने गये हैं, उनको भगवान् विष्णु शान्तिपरक-धर्मका उपदेश करना नहीं चाहते ।। ९ ।।