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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 416, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 416

जबतक वैश्य पशुपालनका कार्य करना चाहे, तबतक मालिकको दूसरे किसीके द्वारा किसी तरह भी वह कार्य नहीं कराना चाहिये, भारत! अब मैं शूद्रका भी धर्म तुम्हें बता रहा हूँ॥ २७ ॥

प्रजापतिर्हि वर्णानां दासं शूद्रमकल्पयत् ।
तस्माच्छूद्रस्य वर्णानां परिचर्या विधीयते ॥ २८ ॥
प्रजापतिने अन्य तीनों वर्णोंके सेवकके रूपमें शूद्रकी सृष्टि की है; अतः शूद्रके लिये तीनों वर्णोंकी सेवा ही शास्त्र-विहित कर्म है ॥ २८ ॥

तेषां शुश्रूषणाच्चैव महत् सुखमवाप्नुयात् ।
शूद्र एतान् परिचरेत् त्रीन् वर्णाननुपूर्वशः ॥ २९ ॥
वह उन तीनों वर्णोंकी सेवासे ही महान् सुखका भागी हो सकता है। अतः शूद्र इन तीनों वर्णोंकी क्रमशः सेवा करे ॥ २९ ॥

संचयांश्च न कुर्वीत जातु शूद्रः कथंचन ।
पापीयान् हि धनं लब्ध्वा वशे कुर्याद् गरीयसः ॥ ३० ॥
शूद्रको कभी किसी प्रकार भी धनका संग्रह नहीं करना चाहिये; क्योंकि धन पाकर वह महान् पापमें प्रवृत्त हो जाता है और अपनेसे श्रेष्ठतम पुरुषोंको भी अपने अधीन रखने लगता है ॥ ३० ॥

राज्ञा वा समनुज्ञातः कामं कुर्वीत धार्मिकः ।
तस्य वृत्तिं प्रवक्ष्यामि यच्च तस्योपजीवनम् ॥ ३१ ॥
धर्मात्मा शूद्र राजाकी आज्ञा लेकर अपनी इच्छाके अनुसार कोई धार्मिक कृत्य कर सकता है। अब मैं उसकी वृत्तिका वर्णन करूँगा, जिससे उसकी आजीविका चल सकती है ॥ ३१ ॥

अवश्यं भरणीयो हि वर्णानां शूद्र उच्यते ।
छत्रं वेष्टनमौशीरमुपानद् व्यजनानि च ॥ ३२ ॥
यातयामानि देयानि शूद्राय परिचारिणे ।
तीनों वर्णोंको शूद्रका भरण-पोषण अवश्य करना चाहिये; क्योंकि वह भरण-पोषण करने योग्य कहा गया है। अपनी सेवामें रहनेवाले शूद्रको उपभोगमें लाये हुए छाते, पगड़ी, अनुलेपन, जूते और पंखे देने चाहिये ॥ ३२ १/२ ॥

अधार्याणि विशीर्णानि वसनानि द्विजातिभिः ॥ ३३ ॥
शूद्रायैव प्रदेयानि तस्य धर्मधनं हि तत् ।
फटे-पुराने कपड़े, जो अपने धारण करने योग्य न रहें, वे द्विजातियोंद्वारा शूद्रको ही दे देने योग्य हैं; क्योंकि धर्मतः वे सब वस्तुएँ शूद्रकी ही सम्पत्ति हैं ॥ ३३ १/२ ॥

यं च कञ्चिद् द्विजातीनां शूद्रः शुश्रूषुराव्रजेत् ॥ ३४ ॥
कल्प्यां तेन तु ते प्राहुर्वृत्तिं धर्मविदो जनाः ।