महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्ये तपसि दाने च यज्ञाधिकरणे तथा ।
धनुर्वेदे च वेदे च नीत्यां चैवानुरक्षणे ॥ २३ ॥
अनृशंसं शुचिं दान्तं सर्वभूतहिते रतम् ।
महारथं त्वत्सदृशं न कंचिदनुशुश्रुम ॥ २४ ॥
'सत्य, तप, दान और यज्ञके अनुष्ठानमें, वेद, धनुर्वेद तथा नीतिशास्त्रके ज्ञानमें, प्रजाके पालनमें, कोमलतापूर्ण बर्ताव, बाहर-भीतरकी शुद्धि, मन और इन्द्रियोंके संयम तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितसाधनमें आपके समान मैंने दूसरे किसी महारथीको नहीं सुना है ॥ २३-२४ ॥
त्वं हि देवान् सगन्धर्वानसुरान् यक्षराक्षसान् ।
शक्तस्त्वेकरथेनैव विजेतुं नात्र संशयः ॥ २५ ॥
आप सम्पूर्ण देवता, गन्धर्व, असुर, यक्ष और राक्षसोंको एकमात्र रथके द्वारा ही जीत सकते थे, इसमें संशय नहीं है ॥ २५ ॥
स त्वं भीष्म महाबाहो वसूनां वासवोपमः ।
नित्यं विप्रैः समाख्यातो नवमोऽनवमो गुणैः ॥ २६ ॥
'महाबाहो भीष्म! आप वसुओंमें वासव (इन्द्र) के समान हैं। ब्राह्मणोंने सदा आपको आठ वसुओंके अंशसे उत्पन्न नवाँ वसु बताया है। आपके समान गुणोंमें कोई नहीं है ॥ २६ ॥
अहं च त्वाभिजानामि यस्त्वं पुरुषसत्तम ।
त्रिदशेष्वपि विख्यातस्त्वं शक्त्या पुरुषोत्तमः ॥ २७ ॥
पुरुषप्रवर! आप कैसे हैं और क्या हैं, यह मैं जानता हूँ। आप पुरुषोंमें उत्तम और अपनी शक्तिके लिये देवताओंमें भी विख्यात हैं ॥ २७ ॥
मनुष्येषु मनुष्येन्द्र न दृष्टो न च मे श्रुतः ।
भवतो वा गुणैर्युक्तः पृथिव्यां पुरुषः क्वचित् ॥ २८ ॥
'नरेन्द्र! मनुष्योंमें आपके समान गुणोंसे युक्त पुरुष इस पृथ्वीपर न तो मैंने कहीं देखा है और न सुना ही है ॥ २८ ॥
त्वं हि सर्वगुणै राजन् देवानप्यतिरिच्यसे ।
तपसा हि भवान् शक्तः स्रष्टुं लोकांश्चराचरान् ॥ २९ ॥
'राजन्! आप अपने सम्पूर्ण गुणोंके द्वारा तो देवताओंसे भी बढ़कर हैं तथा तपस्याके द्वारा चराचर लोकोंकी भी सृष्टि कर सकते हैं ॥ २९ ॥
किं पुनश्चात्मनो लोकानुत्तमानुत्तमैर्गुणैः ।
तदस्य तप्यमानस्य ज्ञातीनां संक्षयेन वै ॥ ३० ॥
ज्येष्ठस्य पाण्डुपुत्रस्य शोकं भीष्म व्यपानुद ।