महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 321, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुधिष्ठिराय प्रोवाच जामदग्न्यस्य विक्रमम् ।। ७ ।।
रास्तेमें चलते-चलते ही महाबाहु भगवान् यादवनन्दन श्रीकृष्ण युधिष्ठिरको जमदग्निकुमार परशुरामजीका पराक्रम सुनाने लगे— ।। ७ ।।
अमी रामह्रदाः पञ्च दृश्यन्ते पार्थ दूरतः ।
तेषु संतर्पयामास पितॄन् क्षत्रियशोणितैः ।। ८ ।।
‘कुन्तीनन्दन! ये जो पाँच सरोवर कुछ दूरसे दिखायी देते हैं, ‘राम-ह्रद’ के नामसे प्रसिद्ध हैं। इन्हींमें उन्होंने क्षत्रियोंके रक्तसे अपने पितरोंका तर्पण किया था ।। ८ ।।
त्रिःसप्तकृत्वो वसुधां कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ।
इहेदानीं ततो रामः कर्मणो विरराम ह ।। ९ ।।
‘शक्तिशाली परशुरामजी इक्कीस बार इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य करके यहीं आनेके पश्चात् अब उस कर्मसे विरत हो गये हैं’ ।। ९ ।।
युधिष्ठिर उवाच
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी कृता निःक्षत्रिया पुरा ।
रामेणेति तथाऽऽत्थ त्वमत्र मे संशयो महान् ।। १० ।।
**युधिष्ठिरने पूछा—**प्रभो! आपने यह बताया है कि पहले परशुरामजीने इक्कीस बार यह पृथ्वी क्षत्रियोंसे सूनी कर दी थी, इस विषयमें मुझे बहुत बड़ा संदेह हो गया है ।। १० ।।
क्षत्रबीजं यथा दग्धं रामेण यदुपुङ्गव ।
कथं भूयः समुत्पत्तिः क्षत्रस्यामितविक्रम ।। ११ ।।
अमित पराक्रमी यदुनाथ! जब परशुरामजीने क्षत्रियोंका बीजतक दग्ध कर दिया, तब फिर क्षत्रिय-जातिकी उत्पत्ति कैसे हुई? ।। ११ ।।
महात्मना भगवता रामेण यदुपुङ्गव ।
कथमुत्सादितं क्षत्रं कथं वृद्धिमुपागतम् ।। १२ ।।
यदुपुङ्गव! महात्मा भगवान् परशुरामने क्षत्रियोंका संहार किसलिये किया और उसके बाद इस जातिकी वृद्धि कैसे हुई? ।। १२ ।।
महता रथयुद्धेन कोटिशः क्षत्रिया हताः ।
तथाभूच्च मही कीर्णा क्षत्रियैर्वदतां वर ।। १३ ।।
वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! महारथयुद्धके द्वारा जब करोड़ों क्षत्रिय मारे गये होंगे, उस समय उनकी लाशोंसे यह सारी पृथ्वी ढक गयी होगी ।। १३ ।।
किमर्थं भार्गवेणेदं क्षत्रमुत्सादितं पुरा ।
रामेण यदुशार्दूल कुरुक्षेत्रे महात्मना ।। १४ ।।
यदुसिंह! भृगुवंशी महात्मा परशुरामने पूर्वकालमें कुरुक्षेत्रमें यह क्षत्रियोंका संहार किसलिये किया? ।। १४ ।।