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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 302

भीष्म उवाच

आरिराधयिषुः कृष्णं वाचं जिगदिषामि याम् ॥ १६ ॥
तया व्याससमासिन्या प्रीयतां पुरुषोत्तमः ।
**भीष्मजी बोले—**मैं श्रीकृष्णके आराधनकी इच्छा मनमें लेकर जिस वाणीका प्रयोग करना चाहता हूँ, वह विस्तृत हो या संक्षिप्त, उसके द्वारा वे पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्न हों ॥ १६ १/२ ॥

शुचिं शुचिपदं हंसं तत्पदं परमेष्ठिनम् ॥ १७ ॥
युक्त्या सर्वात्मनाऽऽत्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ।
जो स्वयं शुद्ध हैं, जिनकी प्राप्तिका मार्ग भी शुद्ध है, जो हंसस्वरूप, तत् पदके लक्ष्यार्थ परमात्मा और प्रजापालक परमेष्ठी हैं, मैं सब ओरसे सम्बन्ध तोड़ केवल उन्हींसे नाता जोड़कर सब प्रकारसे उन्हीं सर्वात्मा श्रीकृष्णकी शरण लेता हूँ ॥ १७ १/२ ॥

अनाद्यन्तं परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदुः ॥ १८ ॥
एको यं वेद भगवान् धाता नारायणो हरिः ।
उनका न आदि है न अन्त। वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं। उनको न देवता जानते हैं न ऋषि। एकमात्र सबका धारण-पोषण करनेवाले ये भगवान् श्रीनारायण हरि ही उन्हें जानते हैं ॥ १८ १/२ ॥

नारायणादृषिगणास्तथा सिद्धमहोरगाः ॥ १९ ॥
देवा देवर्षयश्चैव यं विदुः परमव्ययम् ।
नारायणसे ही ऋषिगण, सिद्ध, बड़े-बड़े नाग, देवता तथा देवर्षि भी उन्हें अविनाशी परमात्माके रूपमें जानने लगे हैं ॥ १९ १/२ ॥

देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ २० ॥
यं न जानन्ति को ह्येष कुतो वा भगवानिति ।
देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग भी जिनके विषयमें यह नहीं जानते हैं कि ‘ये भगवान् कौन हैं तथा कहाँसे आये हैं?’ ॥ २० १/२ ॥

यस्मिन् विश्वानि भूतानि तिष्ठन्ति च विशन्ति च ॥ २१ ॥
गुणभूतानि भूतेशे सूत्रे मणिगणा इव ।
उन्हींमें सम्पूर्ण प्राणी स्थित हैं और उन्हींमें उनका लय होता है। जैसे डोरेमें मनके पिरोये होते हैं, उसी प्रकार उन भूतेश्वर परमात्मामें समस्त त्रिगुणात्मक भूत पिरोये हुए हैं ॥ २१ १/२ ॥

यस्मिन् नित्ये तते तन्तौ दृढे स्रगिव तिष्ठति ॥ २२ ॥
सदसद्ग्रथितं विश्वं विश्वाङ्गे विश्वकर्मणि ।