महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 30, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंइतना कहकर माता कुन्ती थर्रथर्र काँपने लगीं। तब बुद्धिमान् कर्णने हाथ जोड़कर मातासे कहा—'देवि! तुम्हारे चार पुत्र मेरे वशमें आ जायँगे तो भी मैं उनका वध नहीं करूँगा। तुम्हारे पाँच पुत्र निश्चित रूपसे बने रहेंगे। यदि कर्ण मारा गया तो अर्जुनसहित तुम्हारे पाँच पुत्र होंगे और यदि अर्जुन मारे गये तो वे कर्णसहित पाँच होंगे' ।। ३२-३३ १/२ ।।
तं पुत्रगृद्धिनी भूयो माता पुत्रमथाब्रवीत् ।। ३४ ।।
भ्रातॄणां स्वस्ति कुर्वीथा येषां स्वस्ति चिकीर्षसि ।
एवमुक्त्वा किल पृथा विसृज्योपययौ गृहान् ।। ३५ ।।
तब पुत्रोंका हित चाहनेवाली माताने पुनः अपने ज्येष्ठ पुत्रसे कहा—'बेटा! तुम जिन चारों भाइयोंका कल्याण करना चाहते हो, उनका अवश्य भला करना' ऐसा कहकर माता कर्णको छोड़कर घर लौट आयीं ।। ३४-३५ ।।
सोऽर्जुनेन हतो वीरो भ्रात्रा भ्राता सहोदरः ।
न चैव विवृतो मन्त्रः पृथायास्तस्य वा विभो ।। ३६ ।।
उस वीर सहोदर भाईको भाई अर्जुनने मार डाला। प्रभो! इस गुप्त रहस्यको न तो माता कुन्तीने प्रकट किया और न कर्णने ही ।। ३६ ।।
अथ शूरो महेष्वासः पार्थेनाजौ निपातितः ।
अहं त्वज्ञासिषं पश्चात् स्वसोदर्यं द्विजोत्तम ।। ३७ ।।
पूर्वजं भ्रातरं कर्णं पृथाया वचनात् प्रभो ।
तेन मे दूयते तीव्रं हृदयं भ्रातृघातिनः ।। ३८ ।।
द्विजश्रेष्ठ! तदनन्तर युद्धस्थलमें महाधनुर्धर शूरवीर कर्ण अर्जुनके हाथसे मारे गये। प्रभो! मुझे तो माता कुन्तीके ही कहनेसे बहुत पीछे यह बात मालूम हुई है कि 'कर्ण हमारे ज्येष्ठ एवं सहोदर भाई थे।' मैंने भाई की हत्या करायी है; इसलिये मेरे हृदयको तीव्र वेदना हो रही है ।। ३७-३८ ।।
कर्णार्जुनसहायोऽहं जयेयमपि वासवम् ।
सभायां क्लिश्यमानस्य धार्तराष्ट्रैर्दुरात्मभिः ।। ३९ ।।
सहसोत्पतितः क्रोधः कर्णं दृष्ट्वा प्रशाम्यति ।
कर्ण और अर्जुनकी सहायता पाकर तो मैं देवराज इन्द्रको भी जीत सकता था। कौरवसभामें जब दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रोंने मुझे बहुत क्लेश पहुँचाया, तब सहसा मेरे हृदयमें क्रोध प्रकट हो गया; परंतु कर्णको देखकर वह शान्त हो गया ।। ३९ १/२ ।।
यदा ह्यस्य गिरो रूक्षाः शृणोमि कटुकोदयाः ।। ४० ।।
सभायां गदतो द्यूते दुर्योधनहितैषिणः ।
तदा नश्यति मे रोषः पादौ तस्य निरीक्ष्य ह ।। ४१ ।।
जब द्यूतसभामें दुर्योधनके हितकी इच्छासे वे बोलने लगते और मैं उनकी कड़वी एवं रूखी बातें सुनता, उस समय उनके पैरोंको देखकर मेरा बढ़ा हुआ रोष शान्त हो जाता