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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 298

‘माधव! भीष्मजीके प्रभावके विषयमें आप जैसा कहते हैं, वह सब ठीक है। उसमें मुझे भी संदेह नहीं है ॥ २५ ॥
महाभाग्यं च भीष्मस्य प्रभावश्च महाद्युते ।
श्रुतं मया कथयतां ब्राह्मणानां महात्मनाम् ॥ २६ ॥
‘महातेजस्वी केशव! मैंने महात्मा ब्राह्मणोंके मुखसे भी भीष्मजीके महान् सौभाग्य और प्रभावका वर्णन सुना है ॥ २६ ॥
भवांश्च कर्ता लोकानां यद् ब्रवीत्यरिसूदन ।
तथा तदनभिध्येयं वाक्यं यादवनन्दन ॥ २७ ॥
‘शत्रुसूदन! यादवनन्दन! आप सम्पूर्ण जगत्‌के विधाता हैं। आप जो कुछ कह रहे हैं, उसमें भी सोचने-विचारनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ २७ ॥
यदि त्वनुग्रहवती बुद्धिस्ते मयि माधव ।
त्वामग्रतः पुरस्कृत्य भीष्मं यास्यामहे वयम् ॥ २८ ॥
‘माधव! यदि आपका विचार मेरे ऊपर अनुग्रह करनेका है तो हमलोग आपको ही आगे करके भीष्मजीके पास चलेंगे ॥ २८ ॥
आवृत्ते भगवत्यर्के स हि लोकान् गमिष्यति ।
त्वद्दर्शनं महाबाहो तस्मादर्हति कौरवः ॥ २९ ॥
‘महाबाहो! सूर्यके उत्तरायण होते ही कुरुकुलभूषण भीष्म देवलोकको चले जायँगे; अतः उन्हें आपका दर्शन अवश्य प्राप्त होना चाहिये ॥ २९ ॥
तव चाद्यस्य देवस्य क्षरस्यैवाक्षरस्य च ।
दर्शनं त्वस्य लाभः स्यात् त्वं हि ब्रह्ममयो निधिः ॥ ३० ॥
‘आप आदिदेव तथा क्षर-अक्षर पुरुष हैं। आपका दर्शन उनके लिये महान् लाभकारी होगा; क्योंकि आप ब्रह्ममयी निधि हैं’ ॥ ३० ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वैवं धर्मराजस्य वचनं मधुसूदनः ।
पार्श्वस्थं सात्यकिं प्राह रथो मे युज्यतामिति ॥ ३१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! धर्मराजका यह वचन सुनकर मधुसूदन श्रीकृष्णने पास ही खड़े हुए सात्यकिसे कहा—‘मेरा रथ जोतकर तैयार किया जाय’ ॥ ३१ ॥
सात्यकिस्त्वाशु निष्क्रम्य केशवस्य समीपतः ।
दारुकं प्राह कृष्णस्य युज्यतां रथ इत्युत ॥ ३२ ॥
आज्ञा पाते ही सात्यकि श्रीकृष्णके पाससे तुरंत बाहर निकल गये और दारुकसे बोले—‘भगवान् श्रीकृष्णका रथ तैयार करो’ ॥ ३२ ॥
स सात्यकेराशु वचो निशम्य